प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा के प्रति देश को सचेत किया है, साथ ही कथित गोरक्षकों को चेताया है कि वे गोरक्षा के नाम पर हिंसा से बाज आएं। यह दूसरी बार है जब मोदी ने इस मामले में अपना दुख और रोष कड़े शब्दों में जाहिर किया है। इससे पहले, गुजरात के उना कांड के बाद, पिछले साल अगस्त में वे इसी तरह कथित गोरक्षकों पर बरसे थे। दोनों बार, उनका बयान वैसा ही था जैसा देश उनसे अपेक्षा कर रहा था। पर दोनों बार उन्होंने बहुत देर से चुप्पी तोड़ी। मोदी सोशल मीडिया से भी जुडेÞ हैं और दुनिया भर की घटनाओं पर टिप्पणी करते रहते हैं, पर बीफ की अफवाह फैलाने तथा भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मार दिए जाने की घटनाओं पर इससे पहले उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। देशवासियों को रेडियो के जरिये संबोधित करने के अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ की नवीनतम कड़ी में उन्होंने योग, खेल, शौचालय, पुस्तक भेंट करने के महत्त्व आदि अनेक बातों की चर्चा की, पर गोरक्षा के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक पर एक शब्द नहीं कहा। फिर अब उन्हें बोलने की जरूरत क्यों महसूस हुई होगी? उन्हें लगा होगा कि इन घटनाओं से देश की छवि खराब हो रही है, साथ ही उनकी सरकार की भी।
यह दलील नहीं चल सकती कि ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं। बेशक पहले की सरकारों के दौरान भी ऐसी घटनाएं होने के हवाले दिए जा सकते हैं, पर जैसा कि एक ताजा अध्ययन भी कहता है, मोदी सरकार बनने के बाद ऐसी घटनाओं में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। फिर, इस साल के छह महीनों में हालात और खराब हुए हैं। इस अध्ययन के मुताबिक पिछले सात साल में इस तरह की हिंसा में अट्ठाईस लोग मारे गए, जिनमें चौबीस मुसलमान थे, यानी छियासी फीसद। इससे समझा जा सकता है कि यह हिंसा ज्यादातर सुनियोजित रही होगी। बहरहाल, इन घटनाओं के प्रति बैद्धिकों तथा मध्यवर्ग में आक्रोश पनपा है और बुधवार को दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, कोलकाता समेत देश के अनेक शहरों में ‘नॉट इन माइ नेम’ के बैनर से इसका जोरदार इजहार भी हुआ। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी, तो इसके पीछे सिविल सोसायटी की इस नाराजगी का भी असर रहा होगा। देर आयद दुरुस्त आयद। अब सवाल यह है कि उनके ताजा बयान के बाद क्या यह उम्मीद की जाए कि उनकी सरकार और उनकी पार्टी की राज्य सरकारें गोरक्षा के नाम पर अफवाह तथा हिंसा फैलाने और आतंक मचाने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आएंगी? यह सवाल इसलिए उठता है कि भाजपा सरकारों का रवैया नरमी दिखाने, यहां तक कि आंख मूंद लेने का रहा है, जबकि कानून-व्यवस्था तथा नागरिकों के जान-माल की रक्षा किसी भी सरकार का पहला दायित्व होता है।
उत्तर भारत और पश्चिम भारत के राज्यों में गोवध पर पाबंदी बहुत पहले से है। लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों में जैसे गोवध निषेध के कानून को ज्यादा से ज्यादा सख्त बनाने की होड़ चल रही है। यही नहीं, जहां-जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां-वहां कथित गोरक्षकों की बन आई है और बीफ का शक जता कर वे जिस पर चाहे टूट पड़ते हैं। प्रधानमंत्री ने ठीक ही गोरक्षा और गोसेवा के आदर्श उदाहरण के तौर पर गांधी और विनोबा का नाम लिया है। लेकिन इतिहास से आदर्श तो कोई भी गिना सकता है। सरकार के मुखिया से लोग यथार्थ का सामना और उसे बदलने की उम्मीद करते हैं। क्या यह उम्मीद की जाए कि गोरक्षा के बहाने जो कुछ हो रहा है उस पर रोक लग जाएगी?

