सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के सुझाव के चलते अयोध्या विवाद एक बार फिर बातचीत का विषय बन गया। न्यायमूर्ति खेहर की हिदायत है कि बेहतर हो इस मामले को अदालत से बाहर बातचीत से सुलझा लिया जाए। अदालत तभी इसमें पड़ेगी जब ऐसी कोशिशें नाकाम हो जाएंगी। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए, थोड़ा हल्के-फुल्के अंदाज में, न्यायमूर्ति खेहर ने यह भी संकेत दिया कि अगर अदालत की मध्यस्थता से हल निकलता हो, तो वे इसके लिए तैयार हैं। याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया था कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की पहल के लिए वह हस्तक्षेप करे। इस पर सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा उसे कई तरह से देखा जा सकता है।

कुछ लोगों को उनकी सलाह आश्चर्यजनक या अप्रत्याशित लग सकती है तो हो सकता है कुछ को इसमें विवाद के सुलझने की उम्मीदनजर आई हो। राममंदिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद यानी अयोध्या मामला खासकर ढाई-तीन दशक से महज एक अदालती मामला नहीं है, बल्कि यह उससे ज्यादा राजनीतिक मसला रहा है। धार्मिक और सांप्रदायिक भी। 1989 से तो उत्तर प्रदेश के हर चुनाव में अयोध्या का मुद््दा उठता या उठाया जाता रहा है। इस विवाद ने देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कितना तनाव पैदा किया है और कई बार राजनीति में जन-सरोकार के मुद््दों को किस कदर किनारे किया है यह जगजाहिर है। 1989 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब केंद्र में और उत्तर प्रदेश में एक ही दल की सरकार है। और यह दल, भारतीय जनता पार्टी है जिसने मंदिर मुुद्दे से सियासी लाभ बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

केंद्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा का सत्तासीन होना और अदालत की सलाह, क्या यह सिर्फ संयोग है? जो हो, सर्वोच्च न्यायालय ऐसी संस्था है जिसकी निष्पक्षता और तटस्थता हमेशा असंदिग्ध रही है। इसलिए उसकी हिदायत इसी चिंता से प्रेरित होगी कि विवाद की तर्कसंगत परिणति हो। लेकिन बातचीत से विवाद को सुलझाने का सुझाव नया नहीं है, बहुत बार बहुत तरफ से रखा जा चुका है। समस्या यह है कि यह स्थानीय प्रकृति का कोई ऐसा विवाद नहीं है, जिससे बहुत थोड़े-से लोगों का वास्ता हो और जिनके बीच कोई आम सहमति बनाने से काम बन जाए। इसीलिए बातचीत के सुझावों का कोई नतीजा आज तक नहीं निकल पाया है। अदालती लड़ाई भी बहुत लंबी चली है और अब तक अधर में है।

साठ साल की कानूनी लड़ाई के बाद 1 अक्तूबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि का एक तिहाई हिस्सा मस्जिद बनाने के लिए वक्फ बोर्ड को दे दिया जाए। हालांकि इस फैसले को हिंदुत्ववादी संगठनों के दावे को मजबूत करने वाला माना गया, पर कोई भी पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं था। उसके बाद से मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है, जहां फैसला कब आएगा, कौन बता सकता है! इसलिए बातचीत से हल निकालने के मुख्य न्यायाधीश के सुझाव की अहमियत जाहिर है। लेकिन जहां कोई भी पक्ष तनिक पीछे हटने को तैयार न हो, वहां बातचीत की पहल करना भी एक बहुत कठिन काम है। सर्वोच्च अदालत की साख को देखते हुए उसकी मध्यस्थता से समाधान निकलने की उम्मीद की जा सकती है, पर क्या दोनों पक्ष इसके लिए तैयार हैं?