हमारा समाज तो अपने मृतकों के प्रति कुछ ज्यादा ही श्रद्धावनत और उदार माना जाता रहा है। युद्ध में मारे गए शत्रुओं के शवों को भी सम्मान देने की परंपरा थी और है। लेकिन इन दिनों एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएं सुर्खियों में आई हैं, जो शवों की बेहद बेकद्री को दर्शाती हैं। यह हमारे अति आधुनिक होते समाज की छीजती हुई संवेदनशीलता है या कमजोर तबकों के प्रति प्रशासनिक तिरस्कार, या दोनों? ओड़िशा और तमिलनाडु में शवों की बेहुरमती की घटनाएं अभी चर्चा का विषय बनी ही हुई थीं कि इस तरह की एक और झकझोर देने वाली खबर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से आई। मेरठ में एक मां रात भर अपनी बच्ची के शव को अपने घर ले जाने के लिए अस्पताल के कारकुनों से एंबुलेंस की खातिर रिरियाती रही, लेकिन उसे यह सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। बागपत जिले के गांव गौरीपुर निवासी इमराना की ढाई साल की बेटी वायरल बुखार से पीड़ित थी।
जिले के ही किसी अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। स्थिति में सुधार न होते देख इमराना चिकित्सकों की सलाह पर अपनी बेटी को लेकर मेरठ के सरकारी पीएल शर्मा अस्पताल पहुंची। गुरुवार की देर रात हालत बिगड़ने पर उसे मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिया गया। वहां पहुंचने पर चिकित्सकों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। कायदे से तो इसमें इलाज में कोताही का मामला बनता है। लेकिन इमराना ने वहां आपातकालीन वार्ड में एंबुलेंस की मांग की, पर वह अनसुनी कर दी गई। वहां जिम्मेदार लोग उसे यह बताते रहे कि दूसरे जिले में एंबुलेंस ले जाने का कोई नियम ही नहीं है। इमराना एक निजी एंबुलेस चालक को दो सौ रुपए देकर बच्ची का शव ले फिर से पीएल शर्मा अस्पताल पहुंची। इसी अस्पताल में उसकी बच्ची का इलाज हुआ था, इसलिए उसे उम्मीद थी कि यहां से उसे एंबुलेंस मिल जाएगा। पर इमराना को वहां से भी कोई मदद नहीं मिली। आखिरकार उसने एक निजी एंबुलेंस से संपर्क किया तो उसे बताया गया कि ढाई हजार रुपए चाहिए। इतने पैसे उसके पास नहीं थे।
वह रात भर आपातकालीन वार्ड में बैठी बिलखती रही। सुबह होने पर कुछ लोग जरूर इकट्ठा हुए। किसी तरह चंदा इकट्ठा हुआ और निजी एंबुलेंस करके इमराना शव लेकर अपने घर गई। जैसा कि ऐसे तमाम मामलों में होता है, बड़े अफसरों और नेताओं को जब ऐसी बातें बताई जाती हैं तो वे जांच कराने का बयान जारी कर देते हैं। इसमें भी जिलाधिकारी ने जांच कराने की बात कही है। पर कमजोर तबकों के साथ उपेक्षा और तिरस्कार का बर्ताव रोज ही होता है। प्रशासन और सरकार चलाने वाले लोग क्या इससे अनजान हैं? ओड़िशा के कालाहांडी के दाना मांझी का अपनी पत्नी का शव कंधे पर लाद कर बारह किलोमीटर तक नाबालिग बेटी के साथ जाने का दृश्य अभी पुराना नहीं हुआ है। और न ही इसी क्षेत्र के दो व्यक्तियों के एक शव को तोड़-मरोड़ कर गठरी बांध कर ले जाने की घटना भूली है। जिन भी लोगों के साथ ऐसा हो रहा है, वे घोर अभाव और हर तरह की असुविधा की जिंदगी गुजारने पर मजबूर हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ में घीसू कफन के पैसों की दारू पी लेने के बाद कम से कम इतना आश्वस्त था कि उसका समाज दोबारा ‘बुधिया’ के कफन का इंतजाम कर देगा। और आज का समाज?
