गुरुवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने जो प्रस्ताव पारित किया वह स्वागत-योग्य है, मगर इसी के साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या इस पर अमल हो पाएगा? आमराय से पारित इस प्रस्ताव में घाटी में कश्मीरी पंडितों और अन्य प्रवासियों की वापसी की राह आसान करने यानी इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने का संकल्प जाहिर किया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री व नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला के सुझाव पर आए इस प्रस्ताव का एक निर्दलीय विधायक को छोड़ कर, सभी विधायकों ने समर्थन किया। जाहिर है, राज्य के सभी दलों ने इस संकल्प में भरोसा जताया है। पर क्या यह संकल्प पूरा हो पाएगा? क्या इस संकल्प को पारित करने वाले दल और जनप्रतिनिधि इसके लिए पर्याप्त संजीदा हैं?
विधानसभा से संकल्प-प्रस्ताव पारित होने के बावजूद घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी की दूर-दूर तक फिलहाल कोई संभावना नहीं दिखती, तो इसके पीछे कई गहरे कारण हैं।
सत्ताईस साल पहले कश्मीरी हिंदुओं, सिखों और कुछ मुसलमानों को भी दहशतगर्दी के चलते अपना घरबार छोड़ कर घाटी से बाहर भागना पड़ा था। यह कश्मीर के इतिहास का एक बहुत दुखद अध्याय था। उस हिंसा, आतंक और विस्थापन को कश्मीरी पंडित कैसे भूल सकते हैं? लिहाजा, जहां एक तरफ कश्मीर विधानसभा ने संकल्प-प्रस्ताव पारित किया, वहीं दूसरी तरफ इस समुदाय के संगठनों ने सत्ताईस साल पहले के उस दिन को जनसंहार दिवस के रूप में याद किया। शुरू में यह उम्मीद की गई थी कि जैसे ही हालात कुछ ठीक होंगे, विस्थापित लोग अपने घरों को लौट जाएंगे। मगर इतने लंबे दौर में हालात कभी टिकाऊ रूप से सामान्य नहीं हो पाए। आतंकवाद से कश्मीर का पिंड कब छूटेगा, कौन बता सकता है! ऐसे में हैरत की बात नहीं कि विधानसभा का संकल्प-प्रस्ताव किसी में कोई उत्साह नहीं जगा सका है। फिर, कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी का मुद््दा वैसा ही नहीं रह गया है जैसा शुरू के कुछ बरसों में होता था। उनकी एक पूरी पीढ़ी घाटी से बाहर ही पली-बढ़ी है, घाटी से बाहर ही शिक्षा पाई है और विभिन्न क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाया है। लिहाजा, उनमें घाटी घूमने और अपने भूले-बिसरे तार तलाशने का आकर्षण तो होगा, पर घाटी के परिवेश में लौटने की वैसी ललक नहीं है जैसी उनसे पहले की पीढ़ी में दिखती थी।
भाजपा कश्मीरी पंडितों का मुद््दा जोर-शोर से उठाती रही। केंद्र में मोदी सरकार बनने के कुछ समय बाद जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा सत्ता में आ गई, अलबत्ता पीडीपी की साझेदारी में। मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में सरकार बनी तो गठबंधन के एजेंडे में कश्मीरी पंडितों की वापसी की प्रक्रिया शुरू करने का मुद््दा भी शामिल था। इसके लिए बजट में धनराशि भी आबंटित की गई और प्रधानमंत्री ने अनंतनाग, बारामूला और बडगाम में स्थान चिह्नित करने का निर्देश दिया। पर इससेआगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। जैसा कि अब कश्मीरी पंडितों की मांग से भी जाहिर है, सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा की है। गुरुवार को हुए उनके विरोध-प्रदर्शन में अलग ‘होमलैंड’ की मांग उभर कर आई। वर्ष 2008 में यूपीए सरकार ने भी कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए एक पैकेज का एलान किया था। पर शायद ही कोई विस्थापित परिवार घाटी लौटा हो। वित्तीय सहायता की पेशकश धरी की धरी रह गई। दरअसल, इस सिलसिले में पीड़ितों से बातचीत किए बगैर जो भी योजना बनाई जाएगी वह अर्थहीन ही साबित होगी। अगर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दल अपने संकल्प को लेकर संजीदा हैं तो उन्हें कश्मीरी पंडितों की नुमाइंदगी करने वाले संगठनों व संस्थाओं से बातचीत की पहल करनी चाहिए।
