कश्मीर से आए विपक्षी दलों के प्रतिनिधि मंडल की प्रधानमंत्री के साथ हुई बातचीत सार्थक कही जा सकती है। प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधि मंडल की बात गौर से सुनी और उसकी अधिकतर मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया। कश्मीर पिछले डेढ़ महीने से अशांत है। वहां आए दिन सुरक्षा बलों और आम नागरिकों के बीच झड़पें हो जाती हैं। कर्फ्यू और हिंसा से जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीरी युवाओं का आक्रोश फूटा और वह उग्र होता गया। वक्त रहते उसके समाधान का समुचित रास्ता न तलाशे जाने की वजह से स्थिति गंभीर हो गई है। कश्मीरी नेताओं का कहना था कि इस समस्या का हल राजनीतिक पहल से ही संभव है। प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार किया। देखना है, इस दिशा में क्या कदम उठाए जाते हैं। कश्मीर के मौजूदा हालात भारत का अंदरूनी मामला है।
मगर जिस तरह बुरहान वानी के जनाजे के वक्त युवाओं ने कश्मीर की आजादी के नारे लगाए और बाद में पाकिस्तान ने उसे जायज करार दिया उससे तल्खी बढ़ गई। एक दिन पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि कश्मीर में पथराव करने वाले सत्याग्रही नहीं, आक्रमणकारी हैं। ऐसी गलतफहमियों और बयानों के चलते मामला और उलझता गया है। अभी तक हथियार के बल पर आंदोलनकारियों की आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है। केंद्र से वहां के लोगों का कोई संवाद नहीं है। ऐसे में कश्मीरी प्रतिनिधि मंडल का यह सुझाव उचित है कि कश्मीरी लोगों का दिल जीतने के लिए प्रधानमंत्री को उनसे सीधा संवाद कायम करना चाहिए। कश्मीर में व्याप्त असंतोष की प्रकृति को समझने की जरूरत है।
कश्मीर की हर समस्या को पाकिस्तान से जोड़ कर देखने या फिर कश्मीरियों पर बेवजह शक करने से असंतोष बढ़ेगा ही। छिपी बात नहीं है कि कश्मीर में उस तरह रोजगार के अवसर नहीं हैं, जैसे दूसरे राज्यों में हैं। इसलिए वहां का युवा प्राय: गुमराह हो जाता है। केंद्र की यह सोच अपनी जगह सही है कि घाटी में विकास के रास्ते खुलने से युवाओं के गुमराह होने पर रोक लग सकती है। मगर यह भी सही है कि वहां की समस्याओं के समाधान का उपाय एकमात्र विकास नहीं है। अलगाववादी नेता अपना वजूद कायम रखने के लिए कश्मीर में बदअमनी के रास्ते तलाशते रहते हैं। उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू करके घाटी के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश की जा सकती है। मगर केंद्र ने उनसे संवाद रखना जरूरी नहीं समझा है। फिलहाल जिस समीकरण के तहत जम्मू-कश्मीर की सरकार का गठन हुआ है, उससे भी घाटी के लोगों में कई तरह की गलतफहमियां पैदा हुई हैं।
उन्हें दूर करने का यही तरीका हो सकता है कि वहां के लोगों से किसी न किसी तरह केंद्र का संवाद कायम रहे। हथियार के बल पर लोगों का दिल नहीं जीता जा सकता। उनका भरोसा जीतने के लिए संपर्क-सूत्र लगातार जुड़े रहने चाहिए। पाकिस्तान ऐसे मौकों का फायदा उठाने से बाज नहीं आता। वह गुमराह युवाओं को उकसा कर घाटी में दहशत का माहौल कायम रखने की कोशिश करता ही रहता है। मगर वे युवा हमारे अपने नागरिक हैं और उन्हें सही रास्ते पर लाने के उपाय जुटाना सरकार का फर्ज है। पाकिस्तान से रंजिश का असर कश्मीरी युवाओं पर पड़ेगा तो बात बिगड़ेगी ही। उम्मीद की जाती है कि प्रधानमंत्री के साथ कश्मीरी नेताओं की बातचीत से कोई सकारात्मक नतीजा निकलेगा।

