दिल्ली में वायु प्रदूषण रोकने के लिए पिछले दो दशक से बस और टैक्सी जैसे सार्वजनिक वाहनों में सीएनजी लगाने से लेकर कई तरह के उपाय आजमाए जाते रहे हैं। लेकिन आज भी स्थिति में संतोषजनक सुधार नहीं आ पाया है। पिछले साल अप्रैल में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने डीजल से चलने वाले दस साल से अधिक पुराने वाहनों पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे। उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी सख्त रवैया अख्तियार करते हुए इस साल मार्च तक दो हजार सीसी से अधिक क्षमता वाली डीजल चालित एसयूवी कारों के पंजीकरण पर रोक लगा दी थी। मगर इन फैसलों पर अमल की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज भी न सिर्फ ऐसे लाखों वाहन दिल्ली में दौड़ रहे हैं, बल्कि रोजाना सैकड़ों नई गाड़ियां सड़कों पर आ जाती हैं।
बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो इससे पैदा होने वाली समस्या को लेकर गंभीर हैं। डीजल से चलने वाले दस साल से ज्यादा पुराने वाहनों का यातायात पुलिस चालान करती है, लेकिन उसका कोई खास नतीजा नहीं निकला। दरअसल, मोटर वाहन अधिनियम के तहत जुर्माने के बाद ऐसे वाहनों को छोड़ दिया जाता है और वे फिर से सड़कों पर चलने लगते हैं। शायद यही वजह है कि अब राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने ज्यादा सख्ती बरतते हुए डीजल से चलने वाले दस साल से ज्यादा पुराने वाहनों का पंजीकरण रद्द करने का निर्देश दिया है। अगर इस फैसले पर ठीक से अमल हुआ तो सड़कों से करीब दो लाख बयासी हजार वाहनों को हटना पड़ सकता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हरित न्यायाधिकरण के निर्देश पर अमल के बाद माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन पर जो असर पड़ेगा, वस्तुओं की कीमतों में इजाफा होगा, उससे कैसे निपटा जाएगा। जाहिर है, यह सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।
पेट्रोल के मुकाबले डीजल की कीमत कम है, इसलिए भी आजकल बहुत सारे लोग डीजल से चलने वाली बड़ी कारें खरीद रहे हैं। जबकि डीजल पर टैक्स इसलिए कम रखा गया है कि खेती के लिए बड़े पैमाने पर इसकी जरूरत पड़ती है और फिर माल ढुलाई से लेकर सार्वजनिक परिवहन इस पर निर्भर होता है। यह सरकारी नीति का हिस्सा है, ताकि किसान और साधारण लोगों को इसका फायदा मिल सके। लेकिन आज इसी सस्ते र्इंधन का इस्तेमाल महंगी गाड़ियां चलाने में किया जा रहा है। जाहिर है, इसका लाभ जरूरतमंद तबकों के बजाय वे लोग ज्यादा उठा रहे हैं जिनकी आर्थिक हैसियत अच्छी है।
लेकिन इस क्रम में सार्वजनिक वाहनों की तुलना में डीजल चालित गाड़ियों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हुई और इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ा और प्रदूषण की समस्या गहराने लगी। पिछले पांच सालों के दौरान दिल्ली में वाहनों की संख्या में सत्तानबे फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इनमें अकेले डीजल से चलने वाली गाड़ियों की तादाद तीस से पैंतीस फीसद बढ़ी है। हालांकि दिल्ली को प्रदूषित शहर बनाने वाले सबसे ज्यादा जिम्मेदार कारकों में डीजल कारों से निकला धुआं है, लेकिन इसके अलावा यहां की आबो-हवा में पार्टिकुलेट मैटर्स (पीएम) का स्तर खतरनाक हद तक ले जाने वाले दूसरे तत्त्व भी हैं। मसलन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, खुले में जलाया जाने वाला औद्योगिक कचरा और खर-पतवार वगैरह। इसके बावजूद चूंकि डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं सबसे अधिक नुकसानदेह है, इसलिए इस पर काबू पाने में लोगों की सहभागिता भी जरूरी है।

