पिछले कई सालों से डेंगू पर काबू पाने के मकसद से सरकार जागरूकता अभियान चलाती है। इसके मच्छरों से बचाव के लिए तमाम एहतियाती उपायों की सलाह देती है। एनडीएमसी यानी दिल्ली नगरपालिका परिषद और नगर निगम के कर्मचारी घर-घर जाकर डेंगू के मच्छरों के लार्वा की जांच करते हैं। इसमें लापरवाही बरतने वालों का चालान भी किया जाता है। मगर जब राष्ट्रपति भवन जैसी जगह भी डेंगू के मच्छरों का डेरा बनने लगे तो इस खतरनाक बीमारी से लड़ने की तैयारी का अंदाजा लगाया जा सकता है। खबरों के मुताबिक राष्ट्रपति भवन के परिसर में कई जगहों पर पानी जमा होने के कारण वहां डेंगू के मच्छर पनप रहे हैं।
जब एनडीएमसी ने परिसर की जांच की तो कई स्थानों पर इन मच्छरों के लार्वा मिले। विडंबना है कि बीते लगभग आठ महीने के दौरान राष्ट्रपति भवन के विभिन्न परिसरों और रिहाइशों को बावन नोटिस भेजे गए, लेकिन अब भी वहां मच्छरों का डेरा बना हुआ है। गौरतलब है कि पिछले साल इसी मामले में एनडीएमसी की ओर से राष्ट्रपति भवन को सवा सौ से ज्यादा नोटिस जारी किए गए थे। जिस बीमारी से लोगों की जान पर बन आती है, उसे लेकर राष्ट्रपति भवन जैसी जगह तक पर आखिर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे बरती जा रही है? इस मामले में राष्ट्रपति भवन परिसर अकेली जगह नहीं है। दिल्ली मेट्रो के परिसरों, विकास प्राधिकरण, डीटीसी बस डिपो, हवाई अड्डे तक के चालान काटे जा चुके हैं। सवाल है कि ऐसी जगहों पर इस स्थिति के रहते सामान्य लोगों के बीच डेंगू से बचाव के लिए चलाए जा रहे जन-जागरूकता अभियानों को कैसे गति दी जा सकती है?
डेंगू, चिकुनगुनिया और मलेरिया जैसे बुखार का प्रकोप बीते कई सालों से इसी मौसम में खासतौर पर हावी होता है और इसकी चपेट में आकर बहुत सारे लोगों की जान चली जाती है। दिल्ली में अकेले डेंगू से हर साल दर्जनों लोगों की मौत होती है। ये मौतें बचाव इंतजामों से रोकी जा सकती थीं। लेकिन बरसात का मौसम शुरू होने के पहले ही इसके खतरे का अंदाजा होने के बावजूद अस्पतालों को सावधान रहने और लोगों से बचाव के इंतजाम करने की औपचारिक सलाह या निर्देश से बात आगे नहीं बढ़ पाती। डेंगू के खतरों को देखते हुए जागरूकता अभियान तेज करने और मच्छरों के लार्वा की घर-घर जाकर जांच करने जैसी कवायदें शुरू होती हैं। पर कुछ दिनों बाद हालत पहले जैसी हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि एक व्यवस्था जब बनाई जाती है तो उसके नियमित रूप से काम करने के लिए कोई तंत्र विकसित नहीं किया जाता और न उसकी निगरानी की जाती है।
यही वजह है कि थोड़े दिन सचेत रहने के बाद लोग लापरवाही बरतने लगते हैं। हालांकि इस मामले में सरकारी महकमों के ढीले-ढाले रवैए के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर आम लापरवाही के अलावा सामान्य समझ का जो अभाव दिखता है, वह भी डेंगू की मार के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। जबकि इस समस्या पर काबू पाने के लिए सरकार की सक्रियता जितनी जरूरी है, उतनी ही जन-सहभागिता भी। यह ध्यान रखना चाहिए कि बरसात के साथ शुरू होने वाली इस बीमारी का प्रकोप कम से कम नवंबर तक बना रहता है। अगर डेंगू से निपटने के लिए उचित इंतजाम नहीं किए गए तो इस बीच अनेक लोगों को इसके जानलेवा डंक के जोखिम से गुजरना पड़ सकता है।
