नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के प्रदेश अध्यक्ष शुर्होजेली लीजीत्सु को सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक दल का नेता चुने जाने के साथ ही मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लग गया। पर नगालैंड का मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम कई लिहाज से नाटकीय ही कहा जाएगा। पूर्वोत्तर के इस राज्य की विधानसभा में विपक्ष नाममात्र को भी नहीं है। यह अपने आप में लोकतंत्र का मखौल उड़ाने वाला तथ्य है। ऐसा नहीं कि साठ सदस्यीय विधानसभा में सब के सब एनपीएफ के ही विधायक हैं। एनपीएफ के उनचास विधायकों के अलावा चार भाजपा के और सात निर्दलीय हैं। लेकिन किसी को विपक्ष में बैठना गवारा नहीं था। लिहाजा सारे विधायक सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक अलायंस आॅफ नगालैंड (डीएएन) में शामिल हैं। लोकतांत्रिक लिहाज से दूसरी खटकने वाली बात यह है कि किसी भी पार्टी ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के तैंतीस फीसद आरक्षण के विरोध में चले उग्र आंदोलन के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं की। यही नहीं, राज्य की सारी विधायिका ने ‘नगालैंड ट्राइब्स एक्शन कमेटी’ और ‘जाइंट कोआर्डिनेशन कमेटी’ के आगे घुटने टेक दिए।
इन्हीं दोनों साझा संगठनों ने नगर निकायों में महिलाओं को तैंतीस फीसद आरक्षण दिए जाने के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाया था। डीएनए ने जैसी कमजोरी दिखाई उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनजातीय संगठनों की जमीनी ताकत कैसी है। यों नगालैंड में परदा प्रथा नहीं रही है, खान-पान से लेकर पहनावे-ओढ़ावे तथा स्कूल-कॉलेज और बाजार तक, एक प्रकार की आधुनिकता दिखती है। पर एक बार फिर यह जाहिर हुआ कि यह आधुनिकता सतही है और अभी प्रगतिशील मूल्यों के अनुरूप ढल जाने का यह दावा नहीं कर सकती। मुख्यमंत्री पद से टीआर जेलियांग की विदाई से राज्य की राजनीति ने भी अपनी दयनीयता ही दिखाई है। उनके इस्तीफे के बाद नए मुख्यमंत्री के तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य के एकमात्र लोकसभा सदस्य नीफियू रियो का नाम चल रहा था। उनके पक्ष में आमराय बन जाने के बावजूद वे विधायक दल का नेता नहीं चुने जा सके। एक तो इसलिए कि उनके बजाय जेलियांग मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एनपीएफ के अध्यक्ष शुर्होजेली लीजीत्सु को देखना चाहते थे। रियो ही थे जिन्होंने 2015 में जेलियांग को मुख्यमंत्री पद से बेदखल करने की कोशिश की थी। दूसरे, एक तकनीकी बाधा थी।
एनपीएफ ने पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में पिछले साल रियो की सदस्यता अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दी थी। लिहाजा, राज्य के ग्यारहवें मुख्यमंत्री के रूप में लीजीत्सु के चुने जाने का रास्ता साफ हो गया। लीजीत्सु राजनीतिक सक्रियता के अलावा अपनी विद्वत्ता के लिए भी जाने जाते हैं। पर वे ऐसे वक्त मुख्यमंत्री पद का दायित्व लेने जा रहे हैं जब राज्य एक उथल-पुथल से गुजरा है और उसका तनाव अब भी तारी है। लीजीत्सु के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनजातीय संगठनों के विरोध से निपटने और शांति कायम करने की है। क्या वे स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण के प्रावधान को लागू करा पाएंगे? वे इसमें सफल हों या नहीं, उन्हें आंदोलनकारियों से बातचीत की पहल जरूर करनी चाहिए। आखिर यह राज्य के राजनीतिक नेतृत्व का इम्तहान है। साथ ही, नगालैंड की सिविल सोसायटी का भी। क्या मुख्यमंत्री, लोकसभा सदस्य और सारे विधायकों का सम्मिलित प्रभाव इतना नहीं है कि वे जनजातीय संगठनों को एक संवैधानिक प्रावधान तथा गुवाहाटी उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को मानने के लिए मना सकें?
