पिछले पचास दिनों से कश्मीर में तनाव है। आए दिन सुरक्षाबलों और आम नागरिकों के बीच हिंसक झड़पें हो जाती हैं। इस माहौल का फायदा उठा कर अतिवादी संगठन अपने मंसूबों को अंजाम देने की कोशिश करते हैं। मगर अभी तक इस समस्या के व्यावहारिक हल का कोई रास्ता नहीं निकल पाया है। राजनीतिक बयानबाजियां ही ज्यादा होती रही हैं। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलीं। प्रधानमंत्री ने उन्हें कश्मीर समस्या के हल का भरोसा दिया। पिछले हफ्ते जब कश्मीर से विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने आया, तब भी उन्होंने इसी तरह घाटी में अमन का रास्ता तलाशने का भरोसा दिलाया था।
सर्वदलीय बैठक हुई, तब भी कश्मीर के सभी पक्षों से बातचीत करके किसी स्थायी समाधान की तलाश का मंसूबा बांधा गया। सर्वदलीय वार्ताकार समूह गठित करने और घाटी के लोगों से संवाद कायम करने की बात कही गई। मगर अभी तक कोई सार्थक पहल नहीं हो पाई है। इतने समय तक हिंसा का माहौल बने रहने से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर सरकार की कमजोरी उजागर हुई है, बल्कि केंद्र की संजीदगी पर भी सवाल उठने लगे हैं। कश्मीर के हालात की वजहें छिपी नहीं हैं। और न यह पहला मौका है, जब वहां के गुमराह नौजवान इस तरह पत्थरबाजी करते सड़कों पर उतर आए हैं। मगर उन वजहों को दूर करने के सार्थक प्रयास होते नहीं दिख रहे। आतंकी बुरहान वानी के जनाजे के वक्त सुरक्षाबलों और कश्मीरी नागरिकों के बीच हुई झड़पों के बाद कश्मीर की आजादी के लिए जो आवाज बुलंद हुई, उसे समझने की जरूरत है।
यह सही है कि जब भी किसी वजह से कश्मीर में माहौल खराब होता है, पाकिस्तान उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है। वह आंदोलनकारियों को शह देने का प्रयास करता है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि कश्मीरी लोगों को समझने, उनसे बातचीत करके उनकी समस्याओं के समाधान का उपाय तलाशने के बजाय सारा दोष पाकिस्तान का बता कर उधर ही ध्यान केंद्रित कर दिया जाए। कश्मीर में रोजगार के अवसर कम होने की वजह से वहां के युवा आसानी से गुमराह हो जाते हैं। इसके लिए प्रधानमंत्री ने विकास कार्यक्रमों पर जोर देने की बात कही। मगर इस हकीकत को भी ध्यान में रखना चाहिए कि कश्मीरी युवाओं को सही रास्ते पर लाने के लिए विकास एकमात्र उपाय नहीं है। उन्हें गुमराह करने वाले अलगाववादी संगठन तो दोषी हैं ही, धार्मिक नेता भी कम दोषी नहीं हैं। जिस तरह पड़ोसी देशों में आइएस का प्रभाव बढ़ रहा है, उसमें कश्मीरी युवाओं को बरगलाने की आशंका बढ़ती गई है। पर स्थिति यह है कि केंद्र और कश्मीरी लोगों के बीच संवाद काफी समय से रुका हुआ है।
ऐसे में अलगाववादी गतिविधियों को हवा मिली है। हुर्रियत नेताओं को नजरबंद या फिर नजरअंदाज करके नहीं चला जा सकता। पिछले सालों में उनसे बातचीत करके अमन के रास्ते तलाशने में काफी मद मिली थी। आम कश्मीरी रोजी-रोटी और अमन चाहता है, उसे ऐसी संगसारी से नुकसान ही उठाना पड़ता है। मगर अलगाववादी नेता अपने स्वार्थ साधने से बाज नहीं आते। जब तक केंद्र हुर्रियत और कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं को किसी जरिए बातचीत की मेज पर लाने, आम कश्मीरी के मन को समझने की कोशिश नहीं करेगा, गुमराह होते नौजवानों में उनके बेहतर भविष्य रोपने का प्रयास नहीं करेगा, तब तक समस्या का जड़ से समाधान संभव नहीं होगा।

