प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी हफ्ते चीन के दौरे पर जाएंगे, वह भी किसी बहुपक्षीय सम्मेलन में शिरकत करने नहीं, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात करने। विदेश मंत्रालय की इस घोषणा ने थोड़ा चौंकाया, तो बस इसीलिए कि पिछले साल डोकलाम गतिरोध के कारण दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे। दौरे का मकसद उस तनाव को दूर करना और आपसी संबंधों को बेहतर या सामान्य बनाना है। मोदी के चीन दौरे का कार्यक्रम विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की पिछले दिनों हुई चीन यात्रा के दौरान तय हुआ, जब वे एससीओ यानी शंघाई सहयोग संगठन के विदेशमंत्रियों की बैठक में शिरकत करने वहां गई थीं। चीन के विदेशमंत्री वांग यी से उनकी बातचीत में तय हुआ कि सत्ताईस और अट्ठाईस अप्रैल को मोदी और शी की अनौपचारिक शिखर वार्ता आयोजित की जाए। यह सूझ नई नहीं है। 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और चीन के तत्कालीन शासन प्रमुख देंग श्याओ पिंग के बीच इसी तर्ज पर शिखर वार्ता हुई थी और इसे दोनों देशों के रिश्तों में नए अध्याय का आरंभ माना गया।

मोदी के संभावित दौरे से उसी तरह आपसी संबंधों में नई जान डालने की उम्मीद की जा रही है। और सच तो यह है कि डोकलाम गतिरोध के बाद चीन से संबंध सुधारने की कवायद महीनों पहले शुरू हो गई थी। पिछले साल दिसंबर में चीन के विदेशमंत्री वांग यी दिल्ली आए। इसके बाद हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और उनके चीनी समकक्ष यांग जिएची मिले-बैठे। इस साल के शुरू में विदेश सचिव विजय गोखले भी बेजिंग गए थे। दोनों देशों के बीच ग्यारहवें संयुक्त आर्थिक समूह की बैठक हो चुकी है। हाल ही में उनके बीच रणनीतिक-आर्थिक वार्ता भी हुई। दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के आला अधिकारियों की बैठकें भी हुर्इं। इस सब से डोकलाम विवाद से पैदा हुई खटास से उबरने की कोशिशें जाहिर हैं। क्या चीन भी ऐसा चाहता है? कम से कम दो संकेत ऐसे जरूर हैं। चीन ने सिक्किम में नाथू ला मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने पर सहमति जता दी है। करीब दस माह पहले डोकलाम गतिरोध के बाद यात्रा रोक दी गई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय हर साल दो अलग-अलग मार्गों से जून से सितंबर तक यात्रा का आयोजन करता रहा है। इन दो मार्गों में लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथू ला दर्रा (सिक्किम) हैं।

इस यात्रा का धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक महत्त्व भी है। दूसरा सकारात्मक संकेत यह है कि चीन ने ब्रह्मपुत्र और सतलुज नदी में जल प्रवाह से संबंधित आंकड़े भारत के साथ फिर से साझा करने पर सहमति जताई है। डोकलाम की तनातनी के बाद से चीन ने ये आंकड़े मुहैया कराना बंद कर दिया था। ये आंकड़े बाढ़ से निपटने की योजना बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। इन संकेतों से जहां उम्मीद होती है वहीं कुछ संशय भी हैं। क्या विवादित मसलों पर चीन के रुख में तब्दीली आ जाएगी? क्या चीन हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या सरकार के अन्य प्रतिनिधियों के अरुणाचल दौरों पर विरोध जताना बंद कर देगा? क्या बीआरआई यानी बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव से जुड़े भारत के एतराज को वह संजीदगी से लेगा? क्या दक्षिण चीन सागर को लेकर उसका रवैया बदल जाएगा? क्या व्यापारिक असंतुलन और बाजार पहुंच में अवरोध की भारत की शिकायतों का निपटारा होगा? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि प्रस्तावित अनौपचारिक शिखर वार्ता का हासिल क्या रहा।