पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश विधानसभा के भीतर अत्यंत खतरनाक विस्फोटक का पाया जाना कई कारणों से बहुत चिंताजनक है। संसद और विधानसभाएं ऐसी जगहें हैं जहां सर्वाधिक सुरक्षा रहती है। विधानसभा भवनके परिसर में तलाशी और निगरानी के बगैर जाना संभव नहीं। परिसर के आसपास भी चप्पे-चप्पे पर कड़ी नजर रखी जाती है। अगर परिसर या कहीं आसपास विस्फोटक मिलता, तब भी हैरानी की बात होती। पर विस्फोटक मिला सदन के भीतर, जहां विधायकों तथा मार्शलों को छोड़ और किसी को जाने की इजाजत नहीं होती। ऐसी जगह विस्फोटक मिलने की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। जहां सुरक्षा में दो एएसपी, सात डीएसपी और छियासी सब इंस्पेक्टरों समेत नौ सौ जवान तैनात हों, वहां विस्फोटक विधानसभा के भीतर कैसे पहुंचा? अगर विधानसभा सुरक्षित नहीं है, तो बाकी जगहों की बाबत क्या कहा जाए! सदन के भीतर विस्फोटक मिलना किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है। साजिश की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि पीइटीएन यानी पेनाटेरीथ्रीटोल टेट्रानाइट्रेट नामक जो विस्फोटक बरामद हुआ वह काफी शक्तिशाली विस्फोटक माना जाता है। यह डेढ़ सौ ग्राम की मात्रा में था। पीइटीएन का पांच सौ ग्राम पाउडर पूरे विधानभवन को उड़ा सकता है। यह ऐसा विस्फोटक है जो मेटल डिटेक्टर या खोजी कुत्तों की पकड़ में भी नहीं आता है। सितंबर 2011 में दिल्ली हाइकोर्ट में हुए आतंकी हमले में इसी विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें सत्रह लोग मारे गए थे और छिहत्तर लोग घायल हुए थे।

पीइटीएन सदन के भीतर, रूटीन सुरक्षा जांच के दौरान, एक विधायक की सीट पर पड़े कुशन के नीचे नीले रंग की पोलीथिन में मिला। यह चीज वहां तक कैसे पहुंची, इस पर सबको आश्चर्य है और जांच से ही खुलासा हो सकेगा कि इसके पीछे किसका हाथ है। राज्य के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने जांच फौरन शुरू कर दी। उम्मीद है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी इस मामले की तहकीकात करेगी। दिल्ली हाइकोर्ट में हुए हमले के अलावा दुनिया में ऐसी कई आतंकी घटनाएं हुई हैं जिनमें पीइटीएन का इस्तेमाल किया गया। कई मामलों में धमाके से पहले ही, पीइटीएन को छिपा कर रखे जाने का पता चल गया और साजिश नाकाम कर दी गई, जैसा कि ताजा मामले में भी हुआ है। पर सुरक्षा-व्यवस्था पर सवालिया निशान तो लग चुका है। खुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने बीते शुक्रवार को सदन में विस्फोटक पाए जाने की सूचना देते हुए सुरक्षा-व्यवस्था में रही या चली आ रही चूक को स्वीकार किया।
विधान भवन की त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था है।

सचिवालय की अलग सुरक्षा है, विधान भवन के बाहर अलग सुरक्षा है। फिर विधान भवन के भीतर मार्शल की जिम्मेदारी है। लेकिन इनमें समन्वय का अभाव है। इस कमी को दूर करने के साथ ही विधान भवन की सुरक्षा-व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा करने की जरूरत है। इस वाकये के बाद मुख्यमंत्री ने सुरक्षा-व्यवस्था को और चाक-चौबंद करने के लिए कई नए नियमों व उपायों की घोषणा की है। लेकिन समस्या नियमों की कमी की नहीं, उनके अनुपालन के स्तर पर रहती है। अक्सर देखा जाता है कि नियम औपचारिकता में बदल जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि ताजा वाकये के कारण कुछ समय तक जांच, छानबीन और निगरानी की गहमागहमी रहेगी, फिर नए नियम भी धीरे-धीरे खानापूर्ति की तरह हो जाएंगे!