जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर हवाई अड्डे के पास स्थित बीएसएफ के एक शिविर पर मंगलवार को तड़के हुए आतंकी हमले को सुरक्षा बल के जवानों ने बेशक नाकाम कर दिया, लेकिन इससे यही जाहिर हुआ है कि आतंकी संगठनों पर पूरी तरह काबू पाना अभी संभव नहीं हो सका है। फिर भी, इस बार के हमले में आतंकवादियों को मुंह की खानी पड़ी और उनमें से तीन को सुरक्षा बलों ने मार गिराया। इस हमले में सुरक्षा बल के एक सहायक सब-इंस्पेक्टर की जान भी चली गई। पुलिस ने जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों का हाथ होने की बात कही है। शिविर पर हमले के लिए आतंकियों ने उरी की तरह तड़के सुबह का वक्त चुना। यानी उन्हें शायद इस बात का अंदाजा रहा होगा कि सुबह के वक्त ज्यादातर सुरक्षाकर्मी नींद में होते हैं और उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। पिछले साल जब उरी में सैन्य शिविर पर तड़के हमला किया था, तब भारत के सत्रह जवान मारे गए थे और तीस घायल हो गए थे। उसी से सबक लेकर चौकसी के मोर्चे को दुरुस्त किया गया और इस बार सुरक्षा बल ने आतंकियों का हमला नाकाम कर दिया। घटनास्थल पर सीधे मुठभेड़ में आतंकवादियों को मार गिराया गया।
एक अहम पहलू यह भी है कि पिछले कुछ समय के दौरान खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान के मोर्चे पर अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर हुआ है और इससे अचानक होने वाले हमलों से निपटने के लिए पूर्व तैयारी में मदद मिली है। लेकिन सवाल है कि पहले के हमलों के मद्देनजर सुरक्षा-व्यवस्था को पुख्ता करने, निगरानी तंत्र को मजबूत करने और ज्यादा चौकस रहने के बावजूद आतंकियों ने शिाविर पर हमला करने का दुस्साहस कैसे किया! आतंकवादियों के खिलाफ चलाए गए अभियानों के बावजूद सच यह है कि जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी गिरोह अभी शायद कमजोर नहीं पड़े हैं और अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए वे आए दिन बम विस्फोट या गोलीबारी जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। अगर आतंकवादी हवाई अड्डे के पास स्थित सीमा सुरक्षा बल के शिविर जैसे सबसे सुरक्षित घेरों पर भी हमला करने में सक्षम हैं, तो वहां की आम आबादी खुद को किस तरह सुरक्षित और सहज महसूस कर सकती है? जाहिर है, चौकसी और सुरक्षा के साथ-साथ खुफिया तंत्र के मोर्चे पर अभी और ज्यादा सजगता की जरूरत है।
विडंबना यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तमाम फजीहत और भारत की ओर से लगातार चेतावनियों के बावजूद पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा है। हालांकि ब्रिक्स सम्मेलन के साझा घोषणा-पत्र में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम लेकर आलोचना किए जाने के बाद हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने आतंकी गिरोहों के पाकिस्तान की जमीन से अपनी गतिविधियां चलाने की बात कबूल की थी। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ कबूलनामे के भोलेपन से आतंकवाद जैसी समस्या पर काबू पाया जा सकता है? यह तब है जब पाकिस्तान खुद भी ऐसे आतंकी हमलों से दो-चार है और वहां भी अक्सर बड़े पैमाने पर लोग मारे जाते हैं। फिर भी अगर पाकिस्तान को आतंकवादियों पर लगाम लगाने के लिए कोई ठोस पहल करने की जरूरत नहीं पड़ती है तो भारत या फिर दुनिया इसे किस तरह देखे! क्या उसके इसी रवैये से लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को शह नहीं मिलती है?

