मध्यप्रदेश में तीन और किसानों की खुदकुशी की खबर इस बात की परतें उघाड़ती है कि वहां हाल में किसानों के आंदोलन से उभरे तल्ख सवालों के प्रति सरकार किस कदर लापरवाह है। लंबे समय से किसानों की तमाम मांगों की अनदेखी की गई और जब उनका विरोध सड़क पर उतर गया, तब भी सरकार ने कोई ठोस पहल करने के बजाय उनसे निपटने के लिए गोली चलवाना जरूरी समझा। नतीजतन, कम से कम छह लोगों की जान चली गई। उसके बाद जनता के बीच पसर रहे गुस्से के मद्देजनर राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के प्रति सहानुभूति जताते हुए कई घोषणाएं कीं और उपवास भी किया। लेकिन उन्हें सचमुच किसानों की कितनी चिंता है और उनकी समस्याओं के प्रति सरकार कितनी गंभीर है, यह इसी से जाहिर होता है कि सिर्फ बीते कुछ दिनों के भीतर पांच किसानों ने आत्महत्या कर ली। सवाल है कि क्या राज्य में किसानों की हालत यह हो गई है कि या तो वे खुदकुशी कर लें या फिर पुलिस की गोली से मारे जाएं?

इससे ज्यादा अफसोसनाक क्या हो सकता है कि अलग-अलग तरीकों से किसानों की जान जा रही हो और मध्यप्रदेश में भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय यह कहें कि ये मौतें कर्ज से नहीं, बल्कि पारिवारिक परेशानियों या अवसाद के कारण हुई हो सकती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े अगर यह बताते हैं कि मध्यप्रदेश में पिछले नौ सालों के दौरान ग्यारह हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं तो क्या इन सब मौतों की वजहें निजी या पारिवारिक हालात मान ली जाएं? यह गैरजिम्मेदारी और संवेदनहीनता का ही उदाहरण है कि एक ओर किसानों की तकलीफ और उसकी वजहें दुनिया के सामने आ रही हैं, वहीं अब भी उनके दुख और एक बेहद गहराती समस्या को इस नजर से पेश किया जा रहा है। इससे पहले भी जब मंदसौर में पुलिस गोलीबारी में छह किसानों की जान चली गई तो शुरू में सत्तारूढ़ भाजपा और प्रशासन ने गोली चलने की बात से ही इनकार किया था। बाद में जब हकीकत को छिपाना या दबाना मुमकिन नहीं रह गया, तब सरकार ने स्वीकार किया कि पुलिस ने गोली चलाई थी।

सभी जानते हैं कि ये हालात किसी अचानक उपजी समस्या का नतीजा नहीं हैं। सालों से घाटे में जाती खेती, बढ़ते कर्ज का बोझ और फसलों के लिए उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाने जैसी कई समस्याओं से दो-चार किसानों का गुस्सा आखिरकार सड़क पर फूटा। लेकिन सरकार ने समस्या के हल के तौर पर जो रुख अपनाया, वह सबके सामने है। मुश्किल यह है कि चुनावों के पहले किसानों की कर्ज माफी से लेकर तमाम वादे किए गए और अब जब वे याद दिलाए जा रहे हैं तो उनकी अनदेखी की जा रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने साफ लहजे में कहा कि किसानों की कर्जमाफी की व्यवस्था राज्य सरकारें अपने स्तर पर करें। यह बेवजह नहीं है कि किसानों के विरोध का दायरा अब और ज्यादा फैलता जा रहा है। सवाल है कि सरकार को कब यह समझना जरूरी लगेगा कि अगर इस विरोध का विस्तार हुआ तो इससे जुड़ी कई और समस्याएं किस तरह बेकाबू हो सकती हैं! समझना मुश्किल नहीं है कि कॉरपोरेट कंपनियों को दी जा रही कई तरह की राहतों के बीच जब किसानों को कर्ज माफी के सवाल पर कोई उचित जवाब नहीं मिले तो इसका क्या असर पड़ सकता है? न्यूनतम समर्थन मूल्य या फिर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर विचार करना सरकार को क्यों जरूरी नहीं लगता है!