केंद्रीय कारागार भोपाल में सोमवार को किसी बंदी रिश्तेदार से अपनी मां के साथ मिलने आई एक किशोरी और एक मासूम बच्चे के चेहरे पर जेलकर्मियों ने कारागार की मुहर लगा दी। बच्चों के साथ सरकारी कर्मचारियों द्वारा इस तरह की करतूत की दूसरी मिसाल शायद ही मिले। विडंबना यह है कि कारागार अधीक्षक इस पर कार्रवाई करने के बजाय दोषी कर्मियों का बचाव करते नजर आए। उनका कहना था कि मुहर हाथ पर लगाई जाती है, हो सकता है गलती से चेहरे पर लग गई हो। उनका यह बयान किसी के गले इसलिए नहीं उतर सकता कि एक बार गलती हो गई तो क्या दूसरी बार भी गलती हो गई? बच्चों के साथ इस तरह की मनमानी शायद इसलिए हुई कि वे किसी तरह का विरोध करने की स्थिति में ही नहीं थे। बच्चों के चेहरे पर जिस तरह से मुहर जड़ी गई है, उसे देख कर साफ है कि मुहर लगाने वाले ने जानबूझ कर और होशोहवास में ऐसा किया है।
वास्तविकता तो यह है कि जेल नियमावली में चेहरा तो क्या, हाथ पर भी मुहर लगाने का प्रावधान नहीं है। यह कितनी चिंता की बात है कि अब जबकि हमारा देश आजादी की सत्तरवीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है, तब यहां के कारागारों में अंग्रेजों के जमाने के नियम-कायदे लागू हो रहे हैं। असल में, आजादी की लड़ाई के दौर में स्वाभिमानी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेज अफसरों के सामने सिर नहीं झुकाते थे, इसलिए उन्हें अपमानित करने के लिए जेलों में बड़े दरवाजों में एक छोटा दरवाजा लगवाया जाता था और उसमें से कैदियों को गुजारा जाता था। बिना झुके उसमें से गुजरना संभव नहीं होता था। स्वतंत्रता सेनानियों को प्रताड़ित करने का यह एक तरीका था। हाथ पर मुहर मारने का भी तरीका अंग्रेजशाही की ही देन है, जबकि इसे मानवाधिकार का उल्लंघन माना गया है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारें बच्चों की सुरक्षा और देखरेख को लेकर तमाम योजनाएं चला रही हैं। बच्चों के साथ किसी भी किस्म की कड़ाई को क्रूरता की श्रेणी में रखा गया है। घर हो या स्कूल, कहीं भी बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करने या किसी भी किस्म की शारीरिक या मानसिक ज्यादती करने को अपराध माना गया है।
इस मामले मेंं मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग ने जेल महानिदेशक को नोटिस भेजकर सात दिन के भीतर जवाब मांगा है। बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने मामले को गंभीर माना है। राज्य के कारागार मंत्री ने भी कहा है कि दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। अपर महानिदेशक कारागार ने विभागीय जांच के आदेश भी दिए हैं। मगर सवाल है कि जब कारागार अधीक्षक ही नहीं मान रहे कि यह कोई गैरकानूनी कदम है तब हो सकता है कि इस मामले में जांच की लीपापोती कर दी जाए। विचारणीय यह भी है कि अब तक इस तरफ किसी का ध्यान क्यों नहीं गया! इससे यह भी लगता है कि जेलकर्मी अरसे से ऐसा बर्ताव करते आ रहे होंगे। बच्चों की मुहर लगी तस्वीरें अगर अखबारों में न छपी होतीं तो यह मामला भी ठंडा ही रह जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मामले में दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी और आगे के लिए भी जेलकर्मियों को खबरदार किया जाएगा।
