सरकार के ताजा दिशा-निर्देश से उन लोगों ने राहत महसूस की होगी, जिन्हें होटल या रेस्तरां में खाने का चाव है या घर से दूर होने की स्थिति में वहां खाना पड़ता है, मगर अंत में वे सेवा-शुल्क के तौर पर पैसा ऐंठे जाने की वजह से झुंझलाते रहते हैं। उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने बीते हफ्ते एलान किया कि सेवा-शुल्क अनिवार्य नहीं है, ऐच्छिक है। यानी यह ग्राहक की मर्जी पर है कि वह सेवा-शुल्क दे या न दे, या देना चाहे तो कितना दे। यों यह हमेशा से ऐच्छिक ही रहा है, पर होटल-रेस्तरां मालिकों ने इसे ऐसे जबर्दस्त चलन का रूप दे रखा है कि यह व्यवहार में नियम-कानून जैसा हो गया है। इस देश में बहुत सारे कानून कागजों पर ही रह जाते हैं, मगर कानून न होते हुए भी किसी ग्राहक की क्या मजाल कि सेवा शुल्क देने से मना कर दे! टिप या बख्शीश का ही दूसरा नाम है सेवा शुल्क। लेकिन दोनों में फर्क है, यह कि टिप ग्राहक अपनी राजी-खुशी से बैरे को देता है। जबकि सेवा-शुल्क को होटल-रेस्तरां के मालिक बिल का ही हिस्सा बना देते हैं। अलबत्ता यह स्टाफ के नाम पर ही किया जाता है। उसमें से कितना हिस्सा सचमुच स्टाफ के खाते में जाता होगा, कौन जानता है! इस तरह की वसूली का कोई औचित्य नहीं है। होटल-रेस्तरां जो दरें तय करते हैं उनमें उनके मुनाफे के साथ ही स्टाफ पर आने वाले खर्च समेत हर तरह की लागत का हिसाब शामिल रहता ही है। सेवा-शुल्क तो दरअसल स्टाफ के बहाने एक अतिरिक्त कमाई का जरिया है।

ग्राहक सेवा-कर तो चुकाता ही है, जो सरकारी खजाने में जाता है, ग्राहक से सेवा-शुल्क भी वसूल लिया जाता है जिसका कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। सेवा-शुल्क अनिवार्य नहीं, ऐच्छिक होगा, यह एलान पासवान ने तीन महीने में दूसरी बार किया है। जब उन्होंने पहली बार इस आशय की घोषणा की थी तब भी होटल-रेस्तरां चलाने वालों की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उन्होंने अपना चलन बंद नहीं किया, और बिना अपवाद के, अपनी मर्जी से तय की हुई दर से सेवा-शुल्क वसूलना जारी रखा। यही कारण है कि मंत्री महोदय को तीन महीने बाद फिर से यह एलान करना पड़ा कि होटल-रेस्तरां में सेवा शुल्क अनिवार्य रूप से नहीं लगाया जा सकता। सरकारी स्तर पर दूसरी बार एलान करने की नौबत आना क्रियान्वयन की कठिनाइयों की तरफ ही इशारा करता है। जाहिर है, अब सरकार को सख्ती दिखानी होगी। दिशा-निर्देश के मुताबिक बिल में सेवा-शुल्क के हिस्से को खाली छोड़ा जाएगा, जिसे ग्राहक अंतिम भुगतान से पहले अपनी मर्जी से भरेगा। दिशा-निर्देश राज्यों को भी भेजा गया है। पर अब भी अमल की राह आसान नहीं है। अगर सेवा-शुल्क अनिवार्य रूप से लगाया गया है तो ग्राहक उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। लेकिन फिलहाल नियमों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना या अन्य कड़ी कार्रवाई नहीं की जा सकती, क्योंकि मौजूदा उपभोक्ता सुरक्षा कानून मंत्रालय को ऐसा करने की इजाजत नहीं देते। इसलिए ऐसा प्राधिकार होना चाहिए जिसे उपयुक्त कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार हो। अगर मौजूदा उपभोक्ता कानून इसमें नाकाफी जान पड़ते हैं, तो सरकार को एक नई विधायी पहल करने में देर नहीं करनी चाहिए।