पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों से लोगों में नाराजगी के बीच नए बने केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री अल्फोंस कनन्नथानम ने अपने बयान से पलीता लगाने का काम कर दिया। उन्होंने कहा कि पेट्रोल-डीजल खरीदने वाले लोग कोई भूखे रहने वाले नहीं हैं, वे कार और मोटरसाइकिलों से चलते हैं। उन्हें डीजल और पेट्रोल का पैसा खर्च करने में क्यों तकलीफ होनी चाहिए। तेल की कीमत बढ़ाने का फैसला सरकार ने जानबूझ कर किया है। इससे मिलने वाले राजस्व का उपयोग गरीबों के लिए आवास, शौचालय बनाने और बिजली पहुंचाने पर खर्च किया जाता है। यह तर्क इसलिए लोगों के गले नहीं उतर रहा कि पहले ही सरकार ने अलग-अलग मदों में कई तरह के उपकर लगा रखे हैं।

नरेंद्र मोदी ने केंद्र की कमान संभालने के साथ ही तेल पूल के नाम पर सीधे कर संग्रह की घोषणा कर दी थी। तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत काफी नीचे थी। मगर प्रधानमंत्री ने तर्क दिया था कि हम एक विशेष कोष बना कर उसमें ग्राहकों से सीधे प्रति लीटर दो रुपए वसूल कर जमा करेंगे, जिसका उपयोग तेल की कीमतें बढ़ने पर किया जाएगा, ताकि संकट के समय तेल की कीमतों को संतुलित किया जा सके। वह कर बढ़ता ही रहा। हालांकि तबसे लेकर अब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार नीचे बनी हुई हैं। इस वक्त जब कच्चे तेल की कीमत अपने निचले स्तर पर है, लगातार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने की क्या तुक है, सरकार स्पष्ट नहीं करना चाहती।

विचित्र है कि अल्फोंस ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से केवल आम वाहन चालकों पर असर नहीं पड़ता। इससे ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन और फिर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ती हैं। अभी जब विकास दर ने नीचे का रुख किया हुआ है और महंगाई ऊपर चढ़ रही है, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें उनसे पार पाने में मुश्किलें ही पैदा करेंगी। मंत्री पद का निर्वाह करने वाले एक व्यक्ति से ऐसे अतार्किक बयान की अपेक्षा नहीं की जाती। मगर लगता है, सरकार में नीतियों और समस्याओं पर चर्चा को लेकर मंत्रियों में एका नहीं है। सरकार के फैसलों की तरफदारी करना मंत्रियों का कर्तव्य हो सकता है, पर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि वे अतार्किक ढंग से बयान दें। इससे सरकार की छवि खराब होती है। पेट्रोल और डीजल से मिलने वाले राजस्व का कितना हिस्सा अब तक गरीबों के उत्थान के लिए उपयोग किया गया है, इसका कोई जवाब शायद उनके पास नहीं होगा।

अल्फोंस ने यह भी भुला दिया कि यूपीए सरकार के समय जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ने की वजह से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का फैसला किया गया था, तब भाजपा ने किस तरह संसद में हंगामा किया था। उससे पहले का वह वाकया भी शायद उन्हें याद न हो जब अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद परिसर में बैलगाड़ी पर बैठ कर जुलूस निकाला था। अब जब कच्चे तेल की कीमतें काफी कम हैं, डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ा कर गरीबों के उत्थान का हवाला देना तर्कसंगत नहीं है। गरीबों को सबसिडी देने की दलील पर रसोई गैस की कीमतें बढ़ाई जाती रही हैं। शिक्षा और स्वच्छता अभियान के नाम पर उपकर वसूला जा रहा है। मगर इन मामलों में कोई प्रगति नजर नहीं आती। आखिर करों के निर्धारण में कोई व्यावहारिक तर्क तो होना चाहिए।