जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना हुई थी, दुनिया मोटे तौर पर दो खेमों में विभाजित थी। एक खेमा अमेरिका का था, और दूसरा सोवियत संघ का। गुटनिरपेक्ष या निर्गुट आंदोलन का बुनियादी मकसद इन दो खेमों से तटस्थ रहना और विश्व को शीतयुद्ध से मुक्ति दिलाना था। दोनों खेमों के बरक्स इसने विकासशील देशों को एक बड़ा मंच मुहैया कराया और एक कठिन समय में विश्व की ऐतिहासिक सेवा की। इसका पहला सम्मेलन 1961 में बेलग्रेद में हुआ था। इसकी नींव डालने वालों में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के प्रथम राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के दूसरे राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर और यूगोस्लाविया के तत्कालीन राष्ट्रपति टीटो प्रमुख थे। गुटनिरपेक्षता की उनकी अवधारणा रंग लाई और इस आंदोलन में शामिल होने वाले देशों की संख्या बढ़ती गई। खासकर यह विकासशील देशों का सबसे बड़ा मंच हो गया।

लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सार्थकता या प्रासंगिकता पर सवाल उठते रहे हैं। कहा जाता रहा है कि शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद इसका क्या औचित्य रह गया है। यह पहला मौका है जब निर्गुट सम्मेलन में भारत केप्रधानमंत्री ने शिरकत नहीं की। इस मौके पर देश का प्रतिनिधित्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया। कहीं भारत के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के मन में भी तो इस समूह की अहमियत को लेकर शंका नहीं है? या, निर्गुट सम्मेलन में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री इसलिए नहीं गए कि भारत की विदेश नीति में अब अमेरिका के करीब आने की चाहत बहुत बढ़ गई है? यों, यह रुझान यूपीए सरकार के समय ही शुरू हो गया था, जब उसने एटमी समझौते के लिए वाम दलों के समर्थन की कुर्बानी देना मंजूर किया। बहरहाल, गुटनिरपेक्ष खेमा अपनी धार भले खो चुका हो, सदस्य संख्या के लिहाज से यह अब भी एक बड़ा समूह है जिसमें एक सौ बीस देश साझीदार हैं।

निर्गुट आंदोलन की स्थापना के पीछे इरादा शीतयुद्ध से त्राण पाना था। जाहिर है, इसमें विश्व शांति का व्यापकतर उद््देश्य निहित था। आज आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को प्रशस्त कर निर्गुट आंदोलन अपनी विरासत को आगे बढ़ा सकता है। वेनेजुएला के पोर्लामर में सत्रहवें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन के पूर्ण अधिवेशन को संबोधित करते हुए भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने जो कुछ कहा वह प्रकारांतर से निर्गुट समूह को नए सिरे से प्रासंगिक बनाए जाने की तरफ इशारा करना ही था। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि हमारा आंदोलन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करे। उपराष्ट्रपति की यह टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब पिछले दिनों प्रधानमंत्री जी-20, ब्रिक्स और आसियान एवं पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद को लेकर भारत की चिंता जाहिर कर चुके थे।

दूसरा अहम मुद््दा जो महामहिम अंसारी ने पुरजोर तरीके से उठाया वह संयुक्त राष्ट्र में सुधार का था। उन्होंने कहा, आज हमें यह पूछने की जरूरत है कि 1945 में महज इक्यावन देशों के साथ गठित हुआ संगठन क्या वास्तव में उस अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जरूरत को पूरा करने के लिए उपयुक्त है, जिसमें इस समय एक सौ तिरानबे स्वतंत्र-संप्रभु देश हैं और इक्कीसवी सदी की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं? अगर आतंकवाद के खात्मे और संयुक्त राष्ट्र के सुधार यानी इसे विश्व की बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप तथा अधिक लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में निर्गुट आंदोलन कुछ कारगर पहल करे तो अपने संख्याबल के साथ-साथ अपनी सक्रियता तथा प्रभाव का भी अहसास दुनिया को करा सकेगा।