दिल्ली में मलेरिया से पीड़ित एक युवक की मौत से एक बार फिर इस बुखार को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि पिछले कई दशक से इस बीमारी की रोकथाम के लिए कोशिशें जारी हैं, पर अभी स्थिति यह है कि इसकी जद में आने वाले लोगों की तादाद काफी बड़ी है। इसके चलते कइयों की जान जा चुकी है। दिल्ली के मंडावली इलाके में युवक की मौत को पिछले पांच साल में मलेरिया से मौत का पहला मामला बताया जा रहा था। मगर सच यह है कि इसी साल जुलाई में शाहदरा के एक बासठ साल के व्यक्ति की भी मौत मलेरिया की वजह से हो गई। इसके अलावा, भारत में जुलाई तक मलेरिया के लगभग चार लाख इकहत्तर हजार मामले दर्ज किए गए और इनमें एक सौ उन्नीस लोगों की जान चली गई। इस मसले पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में भारत की बेहद चिंताजनक तस्वीर उभरी है।

विकास के दावों के बीच यह कौन-सी स्थिति है कि मलेरिया और डेंगू जैसे बुखार की वजह से सैकड़ों लोगों की जान जा रही है और इसके बरक्स सरकारी इंतजाम लाचार दिख रहे हैं। दिल्ली में इन बीमारियों से लड़ने के लिए तीनों नगर निगमों के करीब चार हजार कर्मचारी तैनात हैं। मगर इनकी लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शहर में अमूमन हर तरफ गड्ढों में जमा पानी, कचरा, गंदगी के ढेर और मच्छरों के पनपने के तमाम स्रोत आम दिखते हैं। यह बेवजह नहीं है कि अकेले इस मौसम में मलेरिया के उन्नीस, डेंगू के पौने आठ सौ और चिकुनगुनिया के साढ़े पांच सौ से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। सवाल है कि क्या इसी इंतजाम के भरोसे भारत मलेरिया या मच्छरजनित रोगों पर काबू पाने का दम भर रहा है?

बीते सोमवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने श्रीलंका को ‘मलेरिया मुक्त देश’ घोषित किया। दरअसल, वहां की सरकार ने एक सुचिंतित योजना के तहत मलेरिया उन्मूलन के लिए जरूरत के मुताबिक नई पद्धति का इस्तेमाल किया और एक ठोस अभियान चला कर इस लक्ष्य को हासिल किया। बुखार के सभी मामलों में मलेरिया की जांच से लेकर इस रोग के विरुद्ध चलाए गए अभियान और एकीकृत प्रबंधन की व्यवस्था के तहत समुदायों को जोड़ कर चौबीसों घंटे हॉटलाइन कायम किया गया, मच्छर पनपने की जगहों की साफ-सफाई, उच्च जोखिम वाली जगहों पर शीघ्र उपचार की व्यवस्था और मच्छररोधी उपायों के बजाय परजीवी नियंत्रण पर जोर देने की रणनीति अपनाई गई।

भूटान, चीन, नेपाल या मलेशिया जैसे देश मलेरिया मुक्त घोषित होने के करीब हैं, तो इन देशों में कामयाबी के लिए चलाए गए अभियान का आखिर वह कौन-सा पहलू है जिसे भारत में लागू नहीं किया जा सकता? आखिर किन वजहों से भारत में मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 2030 तक का लंबा वक्त तय किया गया है? क्या अगले डेढ़ दशक में बीमारियों के असर और उनके नुकसान का आकलन किया गया है? मच्छरजनित रोगों पर थोड़ी-सी ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति के बूते काबू पाया जा सकता है। हमारे देश में पोलियो के मोर्चे पर कामयाब उदाहरण बताता है कि अगर सही दिशा में कोशिश की जाए तो मलेरिया, चिकुनगुनिया या डेंगू जैसे रोगों पर काबू पाना संभव है। मगर कर्मचारियों की लापरवाही और स्वास्थ्य सेवाओं के मद में कम आबंटन जैसी चुनौतियां महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों को भी बेअसर कर देती हैं और इसका खमियाजा साधारण नागरिकों को उठाना पड़ता है।