महाराष्ट्र सरकार ने अपने राज्य के किसानों के कर्ज माफ करने का एलान क्या किया, दूसरे ही दिन केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली का चेतावनी जैसा बयान आ गया। उन्होंने कहा कि अगर कृषिऋण माफ करना है, तो राज्य अपने संसाधनों के बूते करें; केंद्र इस मामले में उनकी कोई मदद नहीं करेगा। महाराष्ट्र से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों के कर्ज माफ करने का फैसला किया था। तब भी केंद्रीय वित्त मंत्रालय का रुख यही था, कि केंद्र से कोई मदद नहीं मिलेगी। यानी वित्त मंत्रालय पर पक्षपात या भेदभाव का आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन सवाल है कि इस मामले में भारतीय जनता पार्टी की नीति क्या है? महाराष्ट्र सरकार को किसानों के आंदोलन के आगे झुकना पड़ा। लेकिन उत्तर प्रदेश में तो कोई आंदोलन नहीं था। वहां कर्जमाफी की मांग को खुद भाजपा ने हवा दी और उसे अपना एक प्रमुख चुनावी मुद््दा बना दिया। खुद प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया था कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही कृषिऋण माफ करने का फैसला हो जाएगा। हुआ भी, अलबत्ता व्यवहार में अभी लागू नहीं हुआ है। तब केंद्रीय वित्तमंत्री क्यों खामोश रहे?

जब प्रधानमंत्री खुद कर्जमाफी का आश्वासन दे रहे हों, यानी उनकी नजर में वह एक उचित कदम हो, तो केंद्र पूरी तरह पल्ला कैसे झाड़ सकता है? जब चुनाव जीतने की गरज हो तो कर्जमाफी सही हो जाएगी, और बाद में उसे गलत बताया जाएगा, यह दोहरा रवैया कैसे चल सकता है! कृषिऋण की माफी पर रिजर्व बैंक के गवर्नर भी चेता चुके हैं। बैंकिंग व्यवस्था के अन्य दिग्गज और कई अर्थशास्त्री भी आगाह करते रहते हैं। उनके मुख्य रूप से दो तर्क हैं, और वे खारिज नहीं किए जा सकते। एक यह कि इससे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा, जबकि पहले से ही उनकी वित्तीय सेहत ठीक नहीं है। दूसरे, ऋण प्रणाली कमजोर होगी। भविष्य में भी कर्जमाफी की मांग उठती रहेगी। लेकिन यह सब चिंता तब क्यों नहीं सताती जब उद्योगों को ‘बेलआउट’ पैकेज दिए जाते हैं और कॉरपोरेट कर्ज का ‘पुनर्गठन’ कर उसका काफी हिस्सा माफ कर दिया जाता है? यह बात सही है कि कर्जमाफी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं है। यह अधिक से अधिक फौरी राहत हो सकती है। यह राहत पहले भी दी जा चुकी है। यूपीए सरकार ने सारे देश के किसानों के कर्ज माफ कर दिए थे। लेकिन उससे किसान हमेशा के लिए कर्जमुक्त नहीं हो सके, कुछ समय बाद फिर कर्ज के बोझ से लद गए, और इस वजह से खुदकुशी का सिलसिला भी जारी रहा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि खेती घाटे का धंधा बनी हुई है।

किसानों की मूल मांग फसलों के वाजिब दाम की है। वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री ने तीन साल में इस दिशा में क्या किया है? जबकि भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में किसानों से वायदा किया था कि अगर वह केंद्र की सत्ता में आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी और किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाएगी। यह कब होगा? अगर नहीं होगा, तो किसान कर्ज के जाल में फंसते रहेंगे और कर्जमाफी की मांग भी उठती रहेगी। उत्तर प्रदेश और फिर महाराष्ट्र सरकार के फैसले के बाद अन्य राज्यों में कर्जमाफी की मांग उठ रही है। पंजाब और कर्नाटक में तो यह मांग उठाने में भाजपा भी शामिल है! भाजपा खुद कर्जमाफी की राजनीति करेगी, तो जेटली की चेतावनी को गंभीरता से कौन लेगा!