देहरादून के गंगोत्री चैरिटेबल अस्पताल में जनसेवा की आड़ में गैरकानूनी रूप से चल रहे किडनी कारोबार के पर्दाफाश से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि कुछ लोग अपने मुनाफे के लिए किस तरह लोगों के भरोसे और कानून के साथ खिलवाड़ करते हैं। उस तकलीफ का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि किसी जरूरतमंद को नौकरी दिलाने का आश्वासन देकर वहां लाया गया और बीमारी की जांच का बहाना बना कर उसकी किडनी निकाल ली गई। यह सिलसिला काफी समय से चला आ रहा था, लेकिन मंगलवार की रात कुछ लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को यह खुलासा करने में कामयाबी मिली कि गंगोत्री चैरिटेबल अस्पताल में बाकायदा संगठित रूप से किडनी का गैरकानूनी कारोबार चलाया जा रहा था। इस गिरोह के लोग दक्षिण भारत के कुछ राज्यों के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैसे कई इलाकों के गरीब लोगों को नौकरी दिलाने का झांसा देते थे और मेडिकल जांच के बहाने उनकी किडनी निकाल लेते थे। जाहिर है, कमजोर पृष्ठभूमि से होने के चलते ज्यादातर लोग अपने साथ हुए अपराध का विरोध नहीं कर पाते, लेकिन अगर कोई आवाज उठाता था तो उसे पचास हजार रुपए से दो लाख रुपए देकर चुप करा दिया जाता था। दूसरी ओर, एक किडनी के प्रत्यारोपण के लिए मरीजों से पचीस से पचास लाख रुपए तक वसूले जाते थे। इस गिरोह के तार देश के कई हिस्सों से लेकर खाड़ी देशों तक से जुड़े हुए थे।
हैरानी की बात है कि जो अस्पताल न्यूज मीडिया प्राइवेड लिमिटेड के तहत चल रहा था और जहां आॅपरेशन थियेटर तो था, लेकिन ओपीडी नहीं चलता था, वह संबंधित महकमों के अधिकारियों के शक और उनकी कार्रवाई से कैसे बचा रह गया? क्या निजी अस्पतालों का तंत्र संबंधित सरकारी महकमों की निगरानी और जांच के दायरे में नहीं आते हैं? अगर ऐसा नहीं है तो इतने समय से उस गिरोह को यह धंधा चलाने की छूट कैसे मिली हुई थी? विडंबना यह है कि इस तरह के अमानवीय धंधे जनसेवा के परदे में चलाए जाते हैं। हाल ही में बलात्कार के सजायाफ्ता दोषी राम रहीम के डेरे से मानव अंगों का अवैध कारोबार करने वाले कई अस्पतालों का मामला जिस तरह सामने आया है, उससे साफ है कि जरूरतमंदों की मदद और कल्याण के नाम पर किस तरह के अमानवीय धंधे चलाए जाते हैं। जनसेवा के नाम पर किडनी के अवैध कारोबार का मामला केवल कानून के लिहाज से अपराध नहीं है, बल्कि यह उस समाज और व्यक्ति के साथ भी धोखा है जो मानवीय संवेदनाओं के चलते ऐसे लोगों या संस्थानों पर भरोसा कर लेते हैं।
देहरादून में सामने आया मामला इस तरह का अकेला उदाहरण नहीं है। लगभग साल भर पहले दिल्ली के मशहूर अपोलो अस्पताल में किडनी के अवैध कारोबार का खुलासा हुआ था। हमारे देश में कई तरह के पूर्वाग्रहों के चलते लोग अंगदान के लिए अपनी ओर से पहल नहीं करते, जबकि इसी को ध्यान में रख कर इससे संबंधित कानूनी प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। इसी वजह से इलाज और प्रत्यारोपण के लिहाज से जिस पैमाने पर अंगों की मांग है, उसके मुकाबले उपलब्धता कम है। दूसरी ओर, अंगों की तस्करी से जुड़ा गिरोह गरीब और जरूरतमंद लोगों को अपने जाल में फंसाता है और इसका अवैध प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों तक पहुंचा देता है। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य महकमे की ओर से सभी अस्पतालों और वैसी तमाम जगहों पर निगरानी और जांच की पुख्ता व्यवस्था की जाए, ताकि इस तरह के अमानवीय कारोबार पर लगाम लगाई जा सके।

