राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने बीते सप्ताह जो छापे डाले वह कश्मीर के हालात से निपटने की दिशा में केंद्र की एक बड़ी कार्रवाई है। इसे अपूर्व भी कह सकते हैं, क्योंकि घाटी में आतंकवाद के पिछले ढाई दशक के इतिहास में इतनी जगह एक साथ छापे नहीं डाले गए थे। इस तरह की कुछ छिटपुट कार्रवाई 2002 में हुई थी। लेकिन ताजा छापों का दायरा बड़ा था। कुल बाईस जगहों में से ज्यादातर छापे घाटी में डाले गए। हुर्रियत के नेताओं और सहयोगियों के घरों तथा कार्यालयों पर। कुछ छापे दिल्ली, हरियाणा में भी पड़े। एनआइए की इस कार्रवाई का मकसद आतंकवाद को मिल रही आर्थिक मदद के स्रोत का पता लगाना और उसके सबूत जुटाना था। एनआइए का दावा है कि उसने विभिन्न ठिकानों से कुल 1.15 करोड़ की नगदी बरामद की। कई ठिकानों पर हिज्बुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के लेटरहेड भी बरामद हुए हैं। ये छापे हुर्रियत के दोनों धड़ों के लिए बड़ा झटका हैं। हुर्रियत के दोनों धड़ों के बीच चाहे जो मतभेद रहते हों, पर एक समानता है, वह है सीमापार से मदद पाने की, जैसा कि एनआइए के छापे इशारा करते हैं। घाटी में हुर्रियत के मददगार कुछ व्यापारियों के यहां पड़े छापों और उनसे हुई पूछताछ से यह भी पता चलता है कि हवाला के जरिए पैसा आता था। एनसीआर में पड़े छापों ने भी इसी सच को उजागर किया है। यों यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि दुनिया भर में संगठित अपराध और हवाला का रिश्ता जगजाहिर है।
कश्मीर में हिंसा तथा उपद्रव को पाकिस्तान की तरफ से शह मिलती है यह बात भी किसी से छिपी नहीं रही है। पर पाकिस्तान इसे दुनिया के सामने राजनीतिक या नैतिक समर्थन की तरह पेश करता आया है। एनआइए की ताजा जांच का महत्त्व यह है कि कश्मीर घाटी के असंतोष को स्वत:स्फूर्त बताने के पाकिस्तान केप्रचार की काट करने में भारत को सहूलियत होगी। भारत यह कह सकेगा कि सारे बवाल के पीछे पाकिस्तान से आ रहा पैसा है। लेकिन खुलासा काफी नहीं है। सरकार को सोचना होगा कि आतंक को वित्तीय मदद के रास्ते स्थायी रूप से कैसे बंद किए जाएं। नोटबंदी के जो मुख्य उद््देश्य सरकार ने बताए थे उनमें एक यह भी था कि इससे आतंकवाद पर नकेल कसी जा सकेगी। वैसा क्यों नहीं हो सका? नोटबंदी के बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आई। बल्कि पिछले चार-पांच महीनों में आतंकी घटनाओं में और बढ़ोतरी ही दिखी है। इससे नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाने का दावा खोखला साबित हुआ है।
एनआइए के छापों के फलस्वरूप यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि अपनी साजिश बेनकाब होने के बाद पाकिस्तान बाज आएगा और घाटी में हिंसा भड़काने के लिए वहां से वित्तीय मदद भेजने की कोशिश नहीं होगी। सीमापार से घुसपैठ की कोशिश भी जारी रहेगी और वहां से पैसा भेजने की भी। लेकिन एनआइए को हासिल हुए तथा आगे और भी मिल सकने वाले सबूतों के सहारे सरकार देश के भीतर आतंकवाद के सारे गुप्त ठिकानों का पता लगा सकती है, और दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने घाटी के असामान्य हालात का सच रख सकती है। इससे कश्मीर के मामले में दुनिया के सामने भारत का पक्ष और मजबूत होने की उम्मीद की जा सकती है।
