जम्मू-कश्मीर में रविवार को हुई घटनाओं ने भारत के इस आरोप को बल प्रदान किया है कि इस राज्य में अशांति फैलाने की कोशिशों में पाकिस्तान मुब्तिला है। दो दिन पहले पुंछ में निर्माणाधीन मिनी सचिवालय के पास दो जगह हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने तीन आतंकियों को ढेर कर दिया। इसमें एक पुलिसकर्मी की भी जान चली गई। दूसरी तरफ पाकिस्तान से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर घुसपैठ की तीन कोशिशें सुरक्षा बलों ने नाकाम कर दीं। यह उनकी चौकसी को दर्शाता है। सतर्क सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधि देखते ही घुसपैठियों को चुनौती दी। घुसपैठियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसका जवाब देते हुए सुरक्षा बलों ने चार घुसपैठियों को मार गिराया। ये घटनाएं ऐसे वक्त हुई हैं जब घाटी में अशांति का सिलसिला चलते करीब दो महीने हो गए हैं, पर अब हालात पहले जितने विकट नहीं हैं। हालांकि विरोध-प्रदर्शन बंद नहीं हुए हैं, पर अब घाटी के ज्यादातर हिस्सों को कर्फ्यू से निजात मिल चुकी है। ऐसे वक्त घुसपैठ और आतंक की गतिविधियां क्या बताती हैं? यही कि आतंकी गुट कतई नहीं चाहते कि घाटी में सामान्य स्थिति बहाल हो।
फिर, अपनी कारस्तानी के लिए उन्होंने एक मुसलिम त्योहार का वक्त चुना। ऐसे मौके पर भी खून-खराबा करने की उनकी साजिश बताती है कि वे मुसलिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं का कितना खयाल रखते हैं! दरअसल, मजहब उनके लिए बस एक रणनीतिक इस्तेमाल की चीज है। पुंछ और अंतरराष्ट्रीय सीमा, दोनों जगह की कार्रवाइयों में सुरक्षा बलों ने अपनी मुस्तैदी और हौसले का परिचय दिया है। पर यह सवाल जरूर उठता है कि ऐसे वक्त, जब राज्य में सुरक्षा बल चप्पे-चप्पे पर तैनात हैं, कुछ आतंकी, जो हथियारों से खूब लैस थे, पुंछ में निर्माणाधीन मिनी सचिवालय की इमारत के पास कैसे पहुंच गए, ऐसी इमारत जो सेना की 93वीं ब्रिगेड मुख्यालय के पास स्थित है।
यह कहीं न कहीं आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी खुफिया एजेंसियों की ढिलाई की तरफ संकेत करता है। बहरहाल, घुसपैठ और आतंकी साजिशों को विफल करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ कई और तकाजे भी हैं जिन पर उतना ही ध्यान देने की जरूरत है, और यह खासकर राजनीतिक नेतृत्व का काम है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के घाटी दौरे का अपेक्षित असर नहीं हुआ, पर यह स्थिति को सामान्य बनाने की दिशा में एक सही कदम था। ऐसे और भी कदम सोचने और उठाने होंगे। स्कूल-कॉलेज खुलें, कारोबार शुरू हो, आवाजाही और संचार समेत सारी सेवाएं बहाल हों तथा सभी पक्षों से संवाद का सिलसिला आरंभ हो। राहत तथा पुनर्वास का काम हो। हालात को सामान्य बनाने के दूसरे लक्षण व तरीके और क्या हो सकते हैं! घुसपैठ की घटनाओं के हवाले से पाकिस्तान की भूमिका को बेपर्दा करना रणनीतिक या कूटनीतिक लिहाज से जरूरी है, पर इसी से घाटी के लोगों का भरोसा नहीं जीता जा सकता। वह तो तभी हो सकता है जब घाटी के लोगों को लगे कि ‘जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत’ कोई जुमला नहीं है, बल्कि ऐसा सूत्र है जो उन्हें अपनी बात बेखौफ कहने और सहानुभूति से सुने जाने का न्योता देता है। अगर हिंसा न हो, तो उन्हें अपने असंतोष का इजहार करने देना चाहिए। पाबंदियों का हटना भी हालात सामान्य होने का ही प्रमाण माना जाता है।

