ऐसे समय में जब देश भर में सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार को खत्म करने की चर्चा हो रही है तब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने अपने उच्चाधिकारी का भ्रष्टाचार उजागर करने वाली एक आईपीएस अधिकारी को संरक्षण देने के बजाय न सिर्फ उसका तबादला कर दिया बल्कि जवाब भी तलब किया। डेढ़ महीने पहले ही महिला अधिकारी की तैनाती हुई थी। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं दिवंगत जयललिता की करीबी और अन्नाद्रमुक (अम्मा) की महासचिव शशिकला आय से अधिक संपत्ति रखने के अपराध में केंद्रीय कारागार बंगलुरु में सजा काट रही हैं। काफी दिनों से उन्हें जेल में विशेष रियायतें देने की खबरें आ रही थीं। यहां तक कि एक सूचनाधिकार कार्यकर्ता ने जेल प्रशासन से इस संबंध में जानकारी भी मांगी थी, लेकिन उसे यही बताया गया कि शशिकला को कोई विशेष सुविधा नहीं दी गई है। इस बीच कड़क छवि वाली आईपीएस अधिकारी डी रूपा को पहली जून को उपमहानिरीक्षक (कारागार) के पद तैनात किया गया। उन्होंने जेल का निरीक्षण करने के बाद अपने विभाग के सबसे बड़े अधिकारी यानी पुलिस महानिदेशक (कारागार) एचएन सत्यनारायण राव को 12 जुलाई को रिपोर्ट सौंपी। इसमें कहा गया था कि शशिकला को विशेष सुविधाएं देने के बदले दो करोड़ रुपए की रिश्वत लिए जाने की चर्चा है, जिसमें खुद राव की भी मिलीभगत है। रिपोर्ट में शशिकला को अलग से रसोई दिए जाने का भी जिक्र है।
हालांकि, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मामले की जांच एक अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी को सौंप दी है। लेकिन सोमवार को अचानक राज्य सरकार ने डी रूपा का पुलिस उपमहानिरीक्षक एवं सड़क सुरक्षा उपायुक्त के पद पर तबादला कर दिया और राव को छुट्टी पर भेज दिया। दोनों अधिकारियों से इस मामले में जवाब भी तलब किया गया है। नोटिस में कहा गया है कि दोनों अधिकारियों ने इस मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाकर आल इंडिया सर्विस कंडक्ट रूल्स का उल्लंघन किया है। पूर्व लोकायुक्त जस्टिस एन संतोष हेगड़े समेत तमाम राजनीतिक और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की है।
जब देश में व्हिसल ब्लोअर सुरक्षा कानून लागू हो चुका है और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने की चर्चा हो रही है, स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिन पहले राजनीतिक दलों से अपील की थी कि वे भ्रष्ट लोगों से किनारा कर लें तब एक ऐसी महिला अधिकारी का, जिसने अपने उच्चाधिकारी के भ्रष्टाचार को उजागर करने का साहस दिखाया है, तबादला करना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता। बल्कि इससे यही संदेश जाता है कि राज्य सरकार भ्रष्टाचार से निपटने की लालसा रखने वाले अधिकारियों को ही हतोत्साहित करना चाहती है। ताज्जुब है कि केंद्रीय कारागार में एक कैदी को विशेष सुविधाएं मिल रही हैं और सरकार को इसकी भनक तक नहीं है! कहां तो सरकार को खुद इसके लिए लज्जित होना चाहिए लेकिन इसके उलट वह अनियमितताओं पर से पर्दा उठाने वाली अधिकारी से ही जवाब तलब करने में लगी है। अगर इस विषय पर सार्वजनिक बहस हुई भी तो इसमें गुनाह जैसी क्या बात है? लोकसेवक भी आखिरकार देश का नागरिक ही होता है और देश और समाज के हित में बोलने से उसे कैसे रोका जा सकता है? ऐसा लगता है कि कर्नाटक सरकार को भ्रष्टाचार से कोई गुरेज नहीं है, बल्कि उसे भ्रष्टाचार की चर्चा से एतराज है। क्या किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का ऐसा रवैया ठीक कहा जा सकता है?
