सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल कश्मीर घाटी में भेजने का सरकार का फैसला देर से ही सही, एक दुरुस्त कदम है। राज्यसभा में कश्मीर के हालात पर हुई चर्चा के दौरान ऐसा प्रतिनिधि मंडल घाटी में भेजने की मांग उठी थी। तब सरकार ने जाने क्यों उसे अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया था। खुद प्रधानमंत्री काफी समय तक चुप्पी साधे रहे, जिस पर सदन में सवाल भी उठे थे। प्रधानमंत्री ने देर से खामोशी तोड़ी और सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजने की पहल भी देर से हुई है। कह सकते हैं कि घाटी के हालात ऐसे नहीं थे कि इस तरह की पहल की जाती। पर इसका इरादा तो सरकार और पहले ही जता सकती थी।
बहरहाल, घाटी के हालात को सामान्य अब भी नहीं कहा जा सकता, पर तुलनात्मक रूप से सुधार या स्थिति के नियंत्रण में आने के संकेत दिख रहे हैं। इक्यावन दिनों तक पूरी घाटी में कर्फ्यू लगे रहने के बाद तीन थाना क्षेत्रों को छोड़ कर बाकी जगहों से कर्फ्यू हटा लिया गया है। पैलेट गन के विकल्प पर विचार करने के लिए एक समिति गठित कर दी गई बै। प्रतिनिधि मंडल के लिए सरकार ने सभी प्रमुख दलों से नाम मांगे हैं। अगुआई स्वाभाविक ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह करेंगे। प्रतिनिधि मंडल में कौन-कौन राजनीतिक शामिल होंगे, इससे ज्यादा अहम सवाल यह है कि तीन दिन के अपने पड़ाव के दौरान प्रतिनिधि मंडल क्या करेगा, किनसे बातचीत होगी और घाटी के लोगों का भरोसा जीतने के लिए केंद्र की ओर से क्या आश्वासन दिए जाएंगे।
बीते रविवार को ‘मन की बात’ संबोधन में प्रधानमंत्री ने ‘एकता’ और ‘ममता’ को कश्मीर समस्या के समाधान का सूत्र बताया। इससे पहले वे अटल बिहारी वाजपेयी के ‘इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’ के फार्मूले को भी दोहरा चुके थे। जब वाजपेयी ने यह सूत्र दिया था तो उन्होंने घाटी के लोगों का दिल छू लिया था। आज इसी बात की सबसे ज्यादा जरूरत है, घाटी के लोगों को लगना चाहिए कि एकता और ममता का सूत्र तथा इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत का फार्मूला कोई जुमला नहीं है, बल्कि इनके पीछे गहरी भावना भी काम कर रही है और भरोसा बहाल करने की तैयारी भी।
सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल इस बात का संकेत होगा कि घाटी के हालात से सारा भारत चिंतित है और वहां के लोगों का दुख-दर्द सुनने को तैयार है। पर सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के श्रीनगर जाने और वहां विभिन्न समूहों से मिलने का कार्यक्रम एकमात्र या आखिरी कार्यक्रम नहीं हो सकता। इस पहल को आगे बढ़ाने की रूपरेखा भी सोचनी होगी। भारत हरगिज नहीं चाहता कि कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो। दूसरी ओर, पाकिस्तान कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। इसी मकसद से उसने अपने सांसदों को अलग-अलग समूहों में विभिन्न देशों में भेजने का फैसला किया है। पाकिस्तान अपनी इस कोशिश में कामयाब हो या नहीं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर के हालात पर यों भी दुनिया भर की नजर रहती है। इसलिए यह और भी जरूरी है कि कश्मीर मसले को पूरी संवेदनशीलता से संभाला जाए। बार-बार के अनुभव से यह साबित हुआ है कि कश्मीर का मसला केवल विकास या केवल कानून-व्यवस्था का नहीं है। इसलिए केवल किसी पैकेज के एलान या महज कुछ प्रशासनिक फेरफार से बात नहीं बनेगी। कुछ ऐसे उपाय भी करने होंगे जो अविश्वास की खाई पाटने में सहायक हों।

