भारत स्थित चीनी राजदूत लू झाओहुई ने सिक्किम सेक्टर में चल रहे गतिरोध को लेकर मंगलवार को जो बयान दिया है, वह आग में घी डालने वाला है। चीनी राजदूत ने कहा है, ‘गेंद भारत के पाले में है और भारत को यह तय करना है कि किन विकल्पों को अपना कर गतिरोध खत्म किया जा सकता है।’ इस बयान को एक तरह से चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले चीनी मीडिया और वहां के थिंक टैंक ने कहा था कि अगर उचित तरीके से नहीं निपटा गया तो युद्ध छिड़ सकता है। झाओहुई ने कहा कि इलाके से भारतीय सैनिकों की वापसी चीन की पूर्वशर्त है, तभी शांतिपूर्ण समाधान हो सकता है।
चीनी राजदूत के बयान को चीनी मीडिया की राय की अगली कड़ी माना जा रहा है। असल में, पिछले बीस दिन से सिक्किम सेक्टर के डोकलाम इलाके में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच गतिरोध बना हुआ है। समस्या तब शुरू हुई, जब चीनी सेना ने भूटान के कब्जे वाले क्षेत्र में सड़क बनानी शुरू कर दी। भूटान से सुरक्षा संबंधी समझौते के कारण भारत के सैनिकों ने स्वाभाविक ही बीच-बचाव किया। चीन ने भारत के सैनिकों पर धक्कामुक्की करने का भी आरोप लगाया है। उधर, लद््दाख सेक्टर से सटी सीमा पर हजारों सैनिक तैनात किए जा चुके हैं और लंबे अरसे बाद हवाई पट्टियां खोल दी गई हैं और पचपन साल बाद टैकों की तैनाती की जा रही है।
दोनों देशों के बीच बढ़ती कटुता के पीछे यों तो कई तरह के कारण हैं, लेकिन ताजा कारण शायद दुनिया में भारत की बढ़ती पैठ और अमेरिका से बढ़ती नजदीकी है। तल्खी बढ़ने की शुरुआत अप्रैल में दलाई लामा के अरुणाचल दौरे के समय हुई, जब चीन सरकार के मुखपत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने तमाम मर्यादाओं को किनारे रखते हुए लिखा कि लगता है भारत 1962 को भूल गया। पिछले दिनों चीन ने एक बार फिर वही बात दोहराई। इसके जवाब में भारत के रक्षामंत्री अरुण जेटली ने भी कड़ी टिप्पणी की कि चीन को सिर्फ 1962 याद रहता है, 1967 नहीं, जब चीनी सैनिकों को भारतीय सेना ने खदेड़ दिया था। जेटली ने यह भी कहा कि 1962 और आज के भारत में बहुत अंतर है।
चीन से टकराव की कुछ वजहें कूटनीतिक भी हैं। भारत संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान स्थित कुछ आतंकी सरगनाओं का मुद्दा उठाता रहा है, और इस मामले में चीन कई बार अपने वीटो का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर चुका है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर (सीपीईसी) को लेकर भी दोनों देशों के बीच संबंध सहज नहीं हैं। अमेरिका से भारत की बढ़ती नजदीकी के कारण भी चीन की त्योरी कुछ चढ़ी हुई है। इसलिए अनेक कूटनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सिक्किम सेक्टर में गतिरोध महज एक बहाना है; चीन अपने वर्चस्व के लिए भारत को एक चुनौती के रूप में देख रहा है, इसलिए एक रणनीति के तौर पर वह भड़काऊ बयानबाजी के जरिए भारत की प्रतिक्रिया की थाह लेने की कोशिश में है। जो हो, सीमा पर अतिक्रमण संबंधी कई विवाद पिछले बरसों में बातचीत से सुलझा लिये गए। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार भी वैसा ही होगा।

