अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात, दोनों देशों के रिश्तों में एक अहम घटना है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद मोदी की यह पहली अमेरिका यात्रा थी। फिर, उनकी इस यात्रा का मकसद पूरी तरह द्विपक्षीय मुद््दों पर बात करना था। वाइट हाउस में मोदी और ट्रंप की बातचीत बीस मिनट तय थी, पर वह पैंतीस मिनट चली। इससे दोनों पक्षों की बढ़ी हुई दिलचस्पी का ही संकेत मिलता है। इस मुलाकात से पहले अमेरिकी प्रशासन ने आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद््दीन को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया। जाहिर है, यह फैसला भारत के हक में है। इस घोषणा के लिए अमेरिका ने यही वक्त क्यों चुना, यह बताने की जरूरत नहीं है। यह भारत को संकेत देना था कि आतंकवाद के मामले में भारत के प्रतिअमेरिका का रुख पहले के मुकाबले कहीं अधिक अनुकूल है। इसके कुछ दिन पहले पाकिस्तान को अमेरिका की सामरिक मदद में कटौती करके भी ट्रंप ने ऐसा ही संकेत दिया था। दोनों नेताओं की बातचीत किन मुद््दों पर और किस दिशा में हुई इसका अंदाजा साझा बयान से लगाया जा सकता है।
साझा बयान भी इसकी तसदीक करता है कि मोदी और ट्रंप की यह मुलाकात द्विपक्षीय मसलों पर केंद्रित रही। यों इसमें कुछ गलत नहीं है। पर यह बात थोड़ी अखरती जरूर है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र होने का दम भरते हुए जब मोदी और ट्रंप बातचीत की मेज पर आए तो आतंकवाद को छोड़ कर कोई और वैश्विक चिंता उनके एजेंडे में नहीं थी। ओबामा के कार्यकाल में द्विपक्षीय बातचीत के बाद जारी साझा बयान में दोनों देशों ने जलवायु संकट से पार पाने के लिए मिलजुलकर काम करने और सौर ऊर्जा के लिए आपसी सहयोग को बुलंदी पर ले जाने का एलान किया था। पर इस बार साझा बयान में जलवायु संकट का कोई जिक्र नहीं आया। क्या अमेरिका बदल गया है, या यह बस ट्रंप प्रशासन का नजरिया है? साझा बयान बताता है कि दोनों देशों के लिए सुरक्षा संबंधी चिंता अहम थी, पर उससे भी ज्यादा अहम आर्थिक मसला था। अमेरिका चाहता है कि भारत सीमाशुल्क कम करने सहित उसके निर्यात में आने वाली बाधाएं जल्दी-जल्दी हटाए। क्या विडंबना है कि ट्रंप एक तरफ संरक्षणवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, और दूसरी तरफ चाहते हैं कि भारत अपने घरेलू बाजार और घरेलू उत्पादकों की चिंता छोड़ अमेरिकी निर्यात के लिए पलक पांवड़े बिछाए।
एच-1 बी वीजा के सिलसिले में मोदी कोई ठोस आश्वासन नहीं पा सके, अलबत्ता अमेरिका ने अपने ग्लोबल एंट्री प्रोग्राम का दरवाजा भारत के लिए भी खोल दिया है। इस मौके पर सैयद सलाहुद््दीन को दुनिया भर के लिए खतरा घोषित करके और पाकिस्तान को सीमापार आतंकी हमलों से बाज आने की चेतावनी देकर ट्रंप ने भारत को खुश करने की कोशिश की है। पर अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान के लिए चेतावनी भरे और कड़े लफ्जों को याद करें, तो एक लंबा सिलसिला नजर आएगा। इसलिए ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान आज भी अमेरिका का गैर-नाटो मित्र देश है, और भारत की तुलना में यह कम रणनीतिक रिश्ता नहीं है। साझा बयान में दक्षिण चीन सागर के मामले में और उत्तर कोरिया के खिलाफ कार्रवाई पर भारत की सहमति दर्ज करा लेना अमेरिकी की कूटनीतिक चतुराई ही मानी जाएगी।
