चुनाव सुधार और पार्टियों को मिलने वाले चंदे के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग पुरानी है। मगर अब तक इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हो पाई है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री के वक्तव्य से इसे लेकर उम्मीद जगी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पार्टियों को मिलने वाले चुनावी चंदे के बारे में जानकारी पाना लोगों का हक है। इसलिए भाजपा को इस मामले में पारदर्शिता बरतने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के नेता चुनावों में अपने परिजनों और रिश्तेदारों को टिकट दिलाने की सिफारिश न करें। यह फैसला संगठन पर छोड़ दें कि वह किसे चुनाव के लिए उपयुक्त समझता है। अगर इन दोनों पक्षों पर पार्टी सकारात्मक कदम उठा पाती है तो यह न सिर्फ दूरे दलों के लिए मिसाल होगी, बल्कि चुनावी राजनीति में शुचिता की संभावना भी बनेगी। प्रधानमंत्री ने कहा है कि बजट सत्र में चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने से संबंधित विधेयक भी पेश किया जाएगा। देखना है, इस दिशा में कितना व्यावहारिक कदम उठाया जा सकता है।
नोटबंदी के बाद भाजपा पर आरोप लगे कि उसकी सरकार काले धन पर रोक लगाने की बात तो करती है, पर वह खुद पार्टी फंड में मिले पैसों का ब्योरा देने से बचती रही है। अगर प्रधानमंत्री के कहे अनुसार चुनावी चंदे को सार्वजनिक करने संबंधी विधेयक पारित हो जाता है, तो विपक्षी दलों की ओर से भाजपा पर लगाया जा रहा यह आरोप स्वत: दूर हो सकता है। नियम है कि पार्टियां बीस हजार रुपए से कम मिले नगद चंदे के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने को बाध्य नहीं हैं। इसलिए देखा गया है कि राजनीतिक दल ज्यादातर नगद चंदा बीस हजार रुपए से कम कीमत में दिखाने का प्रयास करते हैं। भाजपा पर यह भी आरोप है कि उसने सबसे अधिक, करीब अस्सी फीसद, पार्टी फंड में आया पैसा बीस हजार रुपए से कम कीमत में दिखाया। करीब सभी राजनीतिक दल यही तरीका अपनाते देखे जाते हैं। जबसे यह नियम बना है, राजनीतिक दल बड़े चंदों को अलग-अलग कार्यकर्ताओं के नाम से बीस हजार रुपए से कम कीमत में बांट कर दिखाने का प्रयास करते हैं।
शायद ही कोई राजनीतिक दल है, जो ईमानदारी से अपना आय-व्यय जमा कराता है। पिछले कुछ सालों से जिस तरह चुनावों में बढ़-चढ़ कर धन-बल का प्रदर्शन होने लगा है, उससे पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर स्वाभाविक रूप से अंगुलियां उठने लगी हैं। वैसे तो निर्वाचन आयोग ने प्रत्याशी के लिए चुनाव खर्च की सीमा तय कर रखी है, पर पार्टियों के खर्च की सीमा तय नहीं है, इसलिए चुनाव खर्च को तर्कसंगत बनाना कठिन बना हुआ है। जाहिर है कि चुनावों में पार्टियां जो पैसा खर्च करती हैं, वह बड़े उद्योगपतियों की मदद से संभव हो पाता है। इस तरह चुनावों में काफी मात्रा में काला धन सफेद करने का प्रयास किया जाता है और फिर चुनावी मदद के बदले लाभ अर्जित करने की भी कोशिश होती है। भ्रष्टाचार के इस सिलसिले पर तब तक अंकुश नहीं लग सकता जब तक कि कड़े कानूनों के जरिए पार्टियों के बेनामी चंदे पर रोक लगाने का प्रयास न हो। प्रधानमंत्री ने जिस तरह अपनी पार्टी से इसकी शुरुआत करने और जल्दी ही एक व्यावहारिक कानून लाने पर जोर दिया है, उससे स्वाभाविक ही चुनाव सुधार की दिशा में सकारात्मक नतीजे की उम्मीद जगी है।
