यह सही है कि महिलाओं के खिलाफ वाले अपराध अंतिम तौर पर कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर शासन की नाकामी का ही नतीजा होते हैं। लेकिन इस पहलू की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि किसी काम से बाहर निकली अकेली स्त्री के लिए एक पुरुष पर भरोसा करना किस कदर खतरे से खाली नहीं है, भले ही वह उसकी जान-पहचान का हो। शनिवार को दक्षिणी दिल्ली की एक महिला को उसके एक परिचित युवक ने भरोसा दिलाया कि वह अपनी कार से उसे घर पहुंचा देगा। लेकिन उस युवक को इस भरोसे की हत्या करने में हिचक नहीं हुई। दो दोस्तों के साथ मिल कर वह जबरन उसे लेकर अपने कमरे पर ले गया। फिर वहां उसके अलावा चार अन्य लोगों ने भी बलात्कार किया। हाल के दिनों में जैसा देखा गया है, पकड़े जाने के डर से वे शायद उस महिला की हत्या करने से भी नहीं हिचकते। पर हुआ यह कि किसी तरह वह महिला पहली मंजिल से नीचे कूद कर बिना कपड़े के भागी और पुलिस को फोन किया। खबर के मुताबिक पुलिस के आने तक वह उसी हालत में एक जगह सड़क किनारे बैठी रही और किसी ने उसकी मदद नहीं की।

यह इस समाज के बीच पलते उस संवेदनहीन रवैये का सबूत है जिसमें लोग सिर्फ अपनी सुविधा और स्वार्थ में कैद होते जा रहे हैं। दूसरी ओर, सही है कि पुलिस ने पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन वे कौन-सी वजहें हैं कि आपराधिक मानसिकता के लोगों के भीतर यह खौफ पैदा नहीं होता कि वे कानून की गिरफ्त में आ सकते हैं! सोलह दिसंबर 2012 को जब चलती बस में एक छात्रा से बलात्कार और बर्बर तरीके से हत्या की घटना सामने आई थी, तो उसके बाद देश भर में व्यापक जन-असंतोष उभरा था। तब कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर पुलिस की नाकामी के साथ-साथ सामाजिक विसंगितियों पर भी बहस चली थी। मगर ऐसा कहीं से नहीं लगता कि चार साल बाद भी हालत में कोई सुधार आया हो।

आज भी दशा यह है कि राजधानी दिल्ली में महिलाओं के लिए अकेले सड़क पर निकलना एक जोखिम से गुजरना है। पेशेवर अपराधियों की नजरों से अगर वह बच भी जाती है तो कई बार उसके साथ धोखा करने वाला वह होता है, जिस पर वह किन्हीं हालात में भरोसा कर लेती है। कई अध्ययनों में ये तथ्य सामने आ चुके हैं कि यौन-हिंसा के बहुत सारे मामलों में आरोपी महिला या लड़की का कोई परिचित ही होता है। यहां तक कि छोटी बच्चियां तक सुरक्षित नहीं हैं। दूसरी ओर, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के जितने मामले कानून के दरवाजे पर पहुंचते भी हैं, उनमें सजा की दर काफी कम है। यानी महिलाओं के हक में बने तमाम प्रगतिशील और मजबूत कानून भी उनके जीवन को सुरक्षित और सहज बना पाने में नाकाम हैं। यह एक ऐसी जटिल स्थिति है जो पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों के बीच गहरे पैठी यौन कुंठाओं से लड़ती स्त्री की चुनौती को और ज्यादा मुश्किल बना देती है। सवाल है कि इस तस्वीर के रहते हम किस तरह के सभ्य समाज की कल्पना कर रहे हैं!