बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड के बारे में उत्तर प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खान के बयान पर सर्वोच्च अदालत ने उचित ही सख्ती दिखाई है। अदालत ने खान और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। यों आजम खान पहले भी अपने कई बयानों के कारण अपनी, अपनी पार्टी और उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी करा चुके हैं। पर सर्वोच्च अदालत ने उनके जिस बयान का संज्ञान लिया है, वह कहीं ज्यादा आपत्तिजनक है, क्योंकि इसका वास्ता राजनीति में चलने वाली उठापटक या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा से, एक मंत्री के संवैधानिक दायित्वों से और न्याय में पीड़ितों के विश्वास से है। गौरतलब है कि महीने भर पहले कुछ डकैतों ने नोएडा से शाहजहांपुर जा रहे एक परिवार को बुलंदशहर के पास शिकार बनाया और चौदह साल की बच्ची तथा उसकी मां के साथ सामूहिक बलात्कार किया।
यौनहिंसा समेत स्त्रियों के खिलाफ हर तरह के अपराध की घटनाएं रोजाना होती हैं, पर निर्भया मामले की तरह बुलंदशहर कांड में निहित बर्बरता ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। यह घटना उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की बदहाली का प्रतीक बन गई, और उत्तर प्रदेश सरकार कठघरे में नजर आने लगी। पर और भी ज्यादा शर्मनाक पहलू राज्य के एक मंत्री का बयान था। आजम खान ने कहा कि बुलंदशहर मामला एक राजनीतिक साजिश है; चुनाव नजदीक हैं और सरकार की छवि खराब करने के लिए विपक्ष किसी भी हद तक गिर सकता है; इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि इस मामले में कहीं विपक्ष का हाथ तो नहीं है। जाहिर है, यह बयान घोर आपत्तिजनक तो था ही, नितांत संवेदनहीन भी था। यह हैरत की बात है कि कोई मंत्री इस तरह की भाषा बोले। इससे पीड़ित पक्ष को न्याय पाने की कितनी उम्मीद रह जाएगी! वही हुआ भी। पीड़ित पक्ष ने घटना के कोई एक पखवाड़े बाद सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर कर गुहार लगाई कि मामले की सुनवाई दिल्ली में हो और जांच का काम सीबीआइ को सौंप दिया जाए। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने मंत्री महोदय और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।
अदालत ने अभी फैसला नहीं सुनाया है, पर उसके रुख का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। उसने राज्य सरकार से पूछा है कि आपत्तिजनक बयान के मद््देनजर आपराधिक मामला क्यों दर्ज नहीं किया जा सकता। अदालत इस मामले को मंत्री-पद की संवैधानिक मर्यादा से भी जोड़ कर देख रही है और इसमें मदद के लिए उसने जाने-माने विधिवेत्ता और वरिष्ठ वकील फली नरीमन को ‘न्यायमित्र’ के तौर पर चुना है। अदालत का फैसला क्या होगा यह तो बाद में पता चलेगा, पर यह उम्मीद की जा सकती है कि वह निहायत गैर-जिम्मेदाराना और न्यायिक प्रक्रिया को हतोत्साहित करने वाले रवैए के खिलाफ एक सख्त संदेश की तरह होगा। यह पहली बार नहीं है जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने बलात्कार के एक मामले को लेकर घोर संवेदनहीनता का परिचय दिया हो। निर्भया कांड की बाबत एक तथाकथित धर्मगुुरु के बयान की भी काफी आलोचना हुई थी। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बंगाल, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं और यहां यौनहिंसा की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं। विडंबना यह है कि यौनहिंसा के मामलों में ही सजा की दर सबसे कम रही है। लेकिन जहां कोई मंत्री खुद एक संगीन अपराध पर लीपापोती करने वाला बयान दे, वहां इंसाफ की कितनी उम्मीद की जा सकती है!

