दसवीं कक्षा तक की स्कूली शिक्षा में परीक्षा के प्रारूप को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। इस मामले में कई प्रयोग भी किए गए। कभी पांचवीं या आठवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा अनिवार्य थी, जिसे शैक्षिक व्यवस्था को सहज और व्यापक बनाने के मकसद से गैरजरूरी बताया गया। फिर दसवीं कक्षा से आगे बढ़ने के लिए बोर्ड परीक्षा को जरूरी बनाया गया। पर पिछली सरकार में सीबीएसइ के पाठ्यक्रम में इस परीक्षा को वैकल्पिक बना दिया गया। अब एक बार फिर सीबीएसइ यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 2018 से दसवीं में बोर्ड परीक्षा को अनिवार्य बना दिया है। पर यह सवाल फिर उठेगा कि आखिर एक वक्त में स्कूली शिक्षा और परीक्षा के प्रयोग के लिए लागू किए गए नियम-कायदों में इतने कम अंतराल पर बदलाव की जरूरत क्यों पड़ जाती है।
यह तथ्य के रूप में बताया जाता रहा है कि बोर्ड की परीक्षा कक्षाओं की पढ़ाई-लिखाई के स्तर और उसकी गंभीरता को बनाए रखता है।
इसे वैकल्पिक बनाने के बाद विद्यार्थी पढ़ने-सीखने को लेकर उतने गंभीर नहीं रह पाते। हालांकि यह भी सच है कि स्कूली शिक्षा में जटिल पाठ्यक्रम को लेकर तमाम सवाल उठते रहे हैं और उसे विद्यार्थियों के लिए बोझिल बनाने से बचने के सुझाव सामने आते रहे हैं। खासकर परीक्षा को ऐसा स्वरूप देने की बात की जाती रही है, जो विद्यार्थियों के लिए तनाव का कारण न बने। लेकिन इस क्रम में किए गए बदलाव के तहत 2011 में जब बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक स्वरूप दिया गया, तो कुछ समय बाद उसके नकारात्मक असर की भी बात होने लगी। दरअसल, यह धारणा आम रही है कि अगर विद्यार्थियों के दिमाग में अगली कक्षा में पहुंचने के लिए परीक्षा पास करने की चिंता रहती है, तो वे पढ़ने-लिखने में रुचि लेते हैं। परीक्षा पास करने की फिक्र से आजादी उन्हें पढ़ाई-लिखाई के प्रति थोड़ा उदासीन बना देती है। इसे लेकर कई हलकों से यह सवाल उठाया गया कि बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाए जाने से शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। लेकिन सरकार इस तर्क से सहमत नहीं थी।
साल भर पहले लोकसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने के बाद भी विद्यार्थियों का प्रदर्शन अच्छा रहा और शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। इसलिए इस परीक्षा को अनिवार्य बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। मगर अब अगर फिर से दसवीं के लिए बोर्ड की परीक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है, तो जाहिर है कि इसके पीछे चिंता यही होगी कि इससे विद्यार्थियों में पढ़ाई ठीक से करने और परीक्षा पास करने की जिम्मेदारी बनी रहेगी। ऐसे अनेक अध्ययन सामने आ चुके हैं जिनमें शुरुआती कक्षाओं के बच्चों के सीखने का स्तर चिंताजनक है। यानी अगर शिक्षण की पद्धति और इसका माहौल बच्चों में सीखने को लेकर उत्साह और रुचि नहीं जगा पाता तो परीक्षा की अनिवार्यता के बूते इस समस्या से पार पाने की कोशिश कितनी कामयाब होगी, कहना मुश्किल है। इसलिए बोर्ड परीक्षा को अनिवार्य बनाने का फैसला तभी कारगर साबित होगा, जब स्कूली शिक्षा में बुनियादी और व्यावहारिक सुधार किए जाएं और पढ़ाई-लिखाई को बच्चों के लिए सहज बनाया जाए, ताकि अपने पाठ्यक्रम और उससे इतर उनमें सीखने की क्षमता में गुणात्मक स्तर पर बढ़ोतरी हो सके।

