अब आम आदमी पार्टी के लिए अपने नेताओं को संभाले रखना मुश्किल हो रहा है। पंजाब और गोवा विधानसभा के चुनावों में मिली हार के बाद पार्टी ने आरोप लगाया कि वोटिंग मशीन में गड़बड़ी करके उसे सायास हराने का प्रयास किया गया। मगर दिल्ली नगर निगम चुनावों में भी उसे लोगों ने नकार दिया तो जैसे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का धैर्य जवाब दे गया। कई नेता दूसरे दलों का रुख करने लगे। यहां तक कयास लगाया जाने लगा कि आप के बड़ी संख्या में विधायक इस्तीफा दे सकते हैं, जिससे सरकार गिरने का खतरा है। ऐसे में ओखला के विधायक अमानतुल्लाह ने पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास पर निशाना साधते हुए बयान दे डाला कि वे विधायकों और दूसरे नेताओं को भाजपा में ले जाने की साजिश कर रहे हैं। यह बात विश्वास को नागवार गुजरी और उन्होंने बगावती तेवर अपना लिया। आप के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित पार्टी के बड़े नेता उन्हें मनाने में जुट गए और आखिरकार अमानतुल्लाह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर कुमार विश्वास को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाबी हासिल कर ली। उन्हें राजस्थान का प्रभारी बना दिया गया।

मगर इस तरह पार्टी कब तक किसी की बलि लेकर और किसी को पुरस्कृत करके अपने को बचाने का प्रयास करती रहेगी। खुद पार्टी के संयोजक ने स्वीकार किया है कि दिल्ली में उसका जनाधार पचास फीसद कम हुआ है। जिस आंदोलन के जरिए आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ था और जो सपने उसने लोगों के मन में रोपे थे, वे पूरे होते नहीं दिख रहे हैं, इसलिए लोगों का मोहभंग हो रहा है। इसके अलावा पार्टी में जनतांत्रिक माहौल न होने की वजह से उसके नेता असंतुष्ट हैं। आरोप है कि सारे फैसले पार्टी संयोजक की तरफ से लिए जाते हैं। पहले पंजाब के दो सांसदों ने इसी माहौल के चलते पार्टी का साथ छोड़ा था। अगर कोई नेता पार्टी की अंदरूनी व्यवस्था को मजबूत और स्वीकार्य बनाने का कोई सुझाव देता है तो उसे दंडित होना पड़ता है। इसलिए कुमार विश्वास की नाराजगी केवल अमानतुल्लाह के बयान को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बहाने वह सतह पर आ गई। यह अकारण नहीं है कि जब उनकी मान-मनौवल हो रही थी, तो उन्होंने अरविंद केजरीवाल के सामने कुछ शर्तें रखीं, जिनमें एक यह भी थी कि पार्टी के हर कार्यकर्ता की बात सुनी जाए। इस पर पार्टी के संयोजक कितना अमल करेंगे, कहना मुश्किल है।

दिल्ली में सरकार बनने के शुरुआती दिनों में ही जब कुछ वरिष्ठ नेताओं को अपमानित कर पार्टी से बाहर कर दिया गया और उन्होंने अरविंद केजरीवाल के कामकाज के तरीके पर देश भर में घूम कर सवाल उठाना शुरू कर दिया, तभी से सुझाव दिए जा रहे हैं कि उन्हें अपनी कार्यशैली बदलनी चाहिए। मगर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। उसका नतीजा आज यह है कि अरविंद केजरीवाल को अपने नवनिर्वाचित पार्षदों को कसम खिलानी पड़ी कि वे विषम परिस्थितियों में भी पार्टी का साथ नहीं छोड़ेंगे। वह इस कदर कमजोर हो गई है कि कोई भी ताकतवर सदस्य उसकी बांह मरोड़ कर अपनी शर्तें मनवाने लगता है। सिर्फ बयानबाजियों और तकरार में उलझे रहने के बजाय अगर अरविंद केजरीवाल ने समय रहते अपने सदस्यों और आम लोगों का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं किया, तो पार्टी का संभलना मुश्किल होगा।