क्रिकेट की किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारतीय टीम बाकी सभी टीमों को हराने के बाद फाइनल में पाकिस्तान से जीत कर विश्वकप पर कब्जा जमाए और खबरों की दुनिया में इसे एक औपचारिक समाचार से ज्यादा की जगह हासिल न हो तो यह सामाजिक मुख्यधारा की प्रतिक्रिया में छिपे दोहरेपन का ही सबूत है। टी-20 के ताजा विश्वकप में फर्क बस इतना है कि यह मुकाबला दुनिया की कई दृष्टिबाधित क्रिकेट टीमों के बीच था, जिसमें भारत ने जीत हासिल की। रविवार को बंगलुरु के एम चिन्नास्वामी स्टेडियम में दृष्टिबाधितों के टी-20 विश्वकप के फाइनल में पहले खेलते हुए पाकिस्तान ने बीस ओवरों में भारत के सामने जीतने के लिए 198 रनों का लक्ष्य सामने रखा था, जिसे भारत ने अठारह ओवरों में सिर्फ एक विकेट खोकर पार कर लिया। 2014 के बाद यह दूसरा मौका है जब भारत ने दृष्टिबाधितों के टी-20 विश्वकप का खिताब जीता।
विचित्र है कि मौजूदा खेलों में सबसे ज्यादा चर्चा हासिल करने वाले क्रिकेट में दो स्तर की विश्वकप प्रतियोगिता में भारत की टीमें जीत हासिल करती हैं, लेकिन एक के लिए देश भर में उल्लास का माहौल बन जाता है और दूसरी जीत के बारे में बहुत कम लोगों तक खबर पहुंचती है। जबकि आम क्रिकेट प्रतियोगिताओं में जीत के बाद खिलाड़ियों को लेकर सत्ता और समाज में इस कदर मुग्धता का भाव देखा जाता है कि उनके लिए स्वागत, सुविधाओं और आर्थिक प्रोत्साहनों की बरसात हो जाती है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुख्य टीम में खेलने वाले पुरुष खिलाड़ियों को जहां तीन अलग-अलग वर्गों में सालाना पच्चीस लाख से लेकर एक करोड़ रुपए और टी-20 के एक मैच के लिए दो लाख रुपए मिलते हैं, वहीं दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के लिए कई बार अपना खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर, महिलाओं की मुख्य टीम की एक खिलाड़ी को एकदिवसीय या टी-20 मैच के लिए अब तक महज ढाई हजार रुपए मिलते रहे हैं। यह स्थिति इसलिए भी बनी रही है कि बीसीसीआइ यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने दृष्टिबाधितों के क्रिकेट को अभी तक मान्यता नहीं दी है। हैरानी की बात है कि दृष्टिबाधितों के जिस क्रिकेट को आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, पाकिस्तान जैसे क्रिकेट खेलने वाले प्रमुख देश मान्यता दे चुके हैं, उस मामले में भारत अभी पिछड़ा हुआ है। जबकि बीसीसीआइ दुनिया भर में सबसे धनी बोर्ड है।
सवाल है कि इस बंटे हुए नजरिए की बुनियाद आखिर क्या है! यह बेवजह नहीं है कि इसी प्रतिक्रिया को आधार बना कर बाजार भी अपना रुख तय करता है और दृष्टिबाधितों या फिर किसी अन्य शारीरिक कमी के बावजूद किसी खेल में अहम कामयाबी दर्ज करने वाले खिलाड़ियों के प्रति उदासीन रहता है। मुख्य टीम का कोई खिलाड़ी जहां सब कुछ देख कर बल्ला घुमाता है, रन बनाता है या फिर हवा में उछली गेंद को लपकता है, वहीं पूरी तरह या आंशिक दृष्टिबाधितों से बनी टीम का कोई खिलाड़ी एक खास तरीके से तैयार गेंद की आवाज को सिर्फ सुन कर उतना ही काम करता है। जाहिर है, यह सामान्य कहे जाने वाले खिलाड़ियों के बरक्स विशिष्ट योग्यता और क्षमता का सबूत है। अफसोस कि ऐसे खिलाड़ियों को वैसा सम्मान और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं।
