मंगलवार को आए सर्वोच्च अदालत के फैसले के चलते अन्नाद्रमुक की महासचिव शशिकला नटराजन के मुख्यमंत्री बनने की हसरत धूल में मिल गई है। अदालत ने आय से अधिक संपत्ति के कोई बीस साल पुराने मामले में उन्हें चार साल की सजा सुनाई है। साथ ही उन पर दस करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब तमिलनाडु में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर शशिकला और ओ पन्नीरसेल्वम के बीच खींचतान चल रही थी। इस रस्साकशी में शशिकला का ही पलड़ा भारी दिख रहा था। और कुछ दिन पहले तो खुद पन्नीरसेल्वम ने मुख्यमंत्री पद के लिए शशिकला का नाम प्रस्तावित किया था। फिर, पार्टी के विधायक दल की बैठक में वे आमराय से नेता भी चुन ली गर्इं। ऐसा लग रहा था कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की औपचारिकता भर बाकी है। लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले ही यह दिखने लगा कि विधायक दल में शशिकला भले कथित सर्वसम्मति से नेता चुन ली गई थीं, पर यह वास्तव में आमराय नहीं थी।
पार्टी के भीतर विरोध के भी स्वर उठने और फैलने लगे, और अंतत: पन्नीरसेल्वम को अचानक इलहाम हुआ कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्तीफा नहीं दिया था, बल्कि उन्हें इसके लिए मजबूर किया गया था। और इसी के साथ उन्होंने शशिकला के विरुद्ध बगावत का झंडा उठा लिया। फिर कुछ मंत्री और कई सांसद भी उनके समर्थन में आ खड़े हुए। यह साफ दिखने लगा कि अब शशिकला की राह आसान नहीं है और पार्टी दो धड़ों में बंटती जा रही है। तमिलनाडु में शशिकला की सियासी हैसियत नेतृत्व के अपने गुणों के कारण नहीं बल्कि अम्मा यानी जयललिता की बेहद करीबी होने के कारण थी। इसी छवि के सहारे, जयललिता के निधन के कुछ ही दिन बाद, वे पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने में कामयाब हो गर्इं। लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए शशिकला की दावेदारी पर सर्वोच्च अदालत के फैसले ने विराम लगा दिया है। अगर राज्यपाल ने उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी होती, तब भी उन्हें इस्तीफा देना पड़ता। फैसले के मुताबिक चार साल की सजा पूरी करने के बाद अगले छह साल तक यानी अभी से अगले दस साल तक वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। यानी जब वे जेल से बाहर आएंगी तब भी न तो मुख्यमंत्री पद की दावेदार हो सकेंगी, न अगले दो चुनावों में विधायक या मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकेंगी। लेकिन ऐसा लगता है कि वे और उनके समर्थक भरसक यही कोशिश करेंगे कि पन्नीरसेल्वम मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज न रह पाएं।
शशिकला की रणनीति यह मालूम पड़ती है कि अपनी जगह किसी और को नामित करके उसे मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करें। साफ है, अन्नाद्रमुक दो धड़ों में बंट चुकी है और इसकी परिणति औपचारिक टूट में भी हो सकती है। लिहाजा अन्नाद्रमुक के भीतर चल रहा टकराव राज्य में नए राजनीतिक समीकरणों और नई संभावनाओं का भी सबब बन सकता है। अन्नाद्रमुक पूरी तरह जयललिता की शख्सियत और लोकप्रियता पर टिकी हुई थी, और उनके न रहने पर पार्टी का यह हश्र हैरानी की बात नहीं है। जहां तक मुख्यमंत्री पद की मौजूदा दावेदारी का सवाल है, निश्चय ही राज्यपाल को बोम्मई मामले में दिए सर्वोच्च अदालत के फैसले के मुताबिक कदम उठाना चाहिए। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि बहुमत का वास्तविक परीक्षण सदन में ही हो सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तकाजे को पूरा करने की प्रक्रिया राज्यपाल शीघ्र ही शुरू करेंगे।

