इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की छह दिवसीय भारत यात्रा को कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी अगवानी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हवाई अड्डे पहुंचे और प्रोटोकाल तोड़ते हुए गले लग कर गरमजोशी से स्वागत किया। भारत रवाना होने से पहले नेतन्याहू ने अपने संदेश में कहा था कि वे अपने दोस्त नरेंद्र मोदी से मिलने जा रहे हैं और यह यात्रा इजराइल के लिए वरदान साबित होने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें मित्र कह कर संबोधित किया। नेतन्याहू के साथ एक सौ तीस लोगों का व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल भारत आया है, जिनमें प्रतिरक्षा, सूचना तकनीक, ऊर्जा, पर्यटन आदि क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हैं। यह पंद्रह साल बाद इजराइल के किसी बड़े नेता की भारत यात्रा है। पिछली जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इजराइल की यात्रा की थी, जो अब तक भारत के किसी प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। तबसे इजराइल और भारत के रिश्तों में लगातार गरमी बनी हुई है। नेतन्याहू की यात्रा में विभिन्न मुद्दों पर बातचीत और अनेक क्षेत्रों में सहयोग का प्रस्ताव है। इसलिए इस यात्रा को लेकर दुनिया की विशेष दिलचस्पी है।

हालांकि भारत और इजराइल के बीच व्यापारिक रिश्ते पुराने हैं। भारत हर साल करीब एक अरब रुपए का प्रतिरक्षा साजो-सामान खरीदता है। पर पिछले दिनों जब भारत ने इजराइली कंपनी राफेल के साथ रक्षा सौदों को रद्द कर दिया, तो दोनों के संबंधों में कुछ गतिरोध के कयास लगाए जाने लगे थे। वह सौदा पचास अरब डॉलर का था। इस तरह राफेल की मदद से भारत में स्पाइक नाम से तैयार होने वाली एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल की परियोजना पर भी विराम लग गया। नेतन्याहू की इस यात्रा में उस गतिरोध को भी दूर करने के प्रयास होंगे। इसके अलावा इस समय इजराइल अपने लिए बड़े बाजार की तलाश में है। इसलिए वहां से आए अब तक के सबसे बड़े व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल के न सिर्फ रक्षा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार और निवेश की संभावनाएं तलाशने की उम्मीद की जा रही है। नेतन्याहू भारतीय सिनेमा उद्योग को भी आकर्षित करने वाले हैं।

मगर सबसे अधिक दुनिया की निगाहें इस बात पर लगी हुई हैं कि दोनों देशों के बीच फिलस्तीन को लेकर क्या बातचीत होती है। पिछले दिनों जब अमेरिका ने इजराइल की राजधानी के तौर पर यरूशलम को चिह्नित किया था और दुनिया भर में उसका विरोध हुआ था, तब भारत ने भी एक सौ सताईस देशों के साथ उस फैसले पर विरोध जताया था। इस पर बहुत सारे लोगों को इसलिए हैरानी हुई थी कि भारत के अमेरिका से भी संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं, खासकर डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद। ऐसे में माना जा रहा था कि भारत अमेरिका व इजराइल का साथ देगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। पर यह भी पेंच सुलझना जरूरी है कि इजराइल और फिलस्तीन के रिश्तों में भारत की क्या भूमिका होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फिलस्तीन यात्रा प्रस्तावित है। फिलस्तीन चाहता है कि भारत पूर्वी यरूशलम को उसकी राजधानी घोषित करे। हालांकि नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि संयुक्त राष्ट्र में होने वाले मतदान से भारत के साथ उसके रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, वे इससे बहुत आगे निकल चुके हैं। पर उससे भारत की पक्षधरता का पता जरूर चलेगा कि वह वास्तव में किसके साथ है।