इजराइल पर हमास के हमले के बाद भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। प्रधानमंत्री ने इजराइल के प्रधानमंत्री से फोन पर बात कर उन्हें आश्वस्त किया कि भारत उनके साथ खड़ा है। भारत का यह रुख सिर्फ इसलिए नहीं है कि इजराइल से उसके रिश्ते काफी मजबूत हैं और दोनों देशों के व्यापारिक संबंध लगातार प्रगाढ़ होते गए हैं।

बल्कि इस समय भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह दुनिया में कहीं भी और किसी भी प्रकार के आतंकवाद के खिलाफ है। हमास एक आतंकवादी संगठन है और जिस तरह उसने इजराइल पर हमला किया और कई सौ लोगों को मार डाला, वह मानवता के विरुद्ध उठाया गया कदम है। हालांकि इजराइल ने हमास के इस हमले को युद्ध कहा और उस पर पलटवार करते हुए पूरे गाजा क्षेत्र की घेराबंदी कर दी है।

उसने हमास को नेस्तनाबूद करने का संकल्प दोहराया है। इस हमले के बाद दुनिया भर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस्लामी देशों के लामबंद होने और इजराइल के खिलाफ बड़े युद्ध की आशंका भी जताई जा रही है। अमेरिका ने इजराइल को मदद भेजनी शुरू कर दी है। ऐसे में फिर से दुनिया दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है।

मगर दुनिया के तमाम देशों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं और वे सुरक्षा से अधिक अपने व्यापारिक रिश्तों को अहमियत देते देखे जा रहे हैं। इसलिए माना जा रहा है कि फिलस्तीन के समर्थन और इजराइल के विरोध में कोई बड़ी लामबंदी नहीं हो सकती। चूंकि हमास को ईरान की शह मिली हुई है, इसलिए उसके इजराइल के खिलाफ मैदान में उतरने की संभावना अधिक जताई जा रही है।

मगर वैश्विक मंच पर आज कोई ऐसा देश नहीं है, जो इस तरह किसी आतंकी संगठन के पक्ष में उतरना चाहेगा। इजराइल की दुश्मनी फिलस्तीन से है। फिलस्तीन के हिस्से की जमीन इजराइल ने हथिया रखी है। इसे संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी सुलझाने का प्रयास किया गया, मगर इजराइल के रुख में कोई बदलाव नहीं आया। कोई भी लोकतांत्रिक देश इस तरह किसी देश के भूभाग पर कब्जा करने के प्रयासों को उचित नहीं ठहरा सकता।

इसीलिए भारत भी शुरू से फिलस्तीन का पक्षधर रहा है। अब भी वह इजराइल के साथ जरूर है, मगर फिलस्तीन के हक के खिलाफ नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री के इजराइल के साथ खड़े होने की घोषणा पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह आ रही है, जैसे भारत फिलस्तीन के विरोध में खड़ा है।

दुनिया के अनेक देश आतंकवाद का निशाना झेल चुके हैं। अमेरिका, फ्रांस और भारत काफी बड़ा नुकसान उठा चुके हैं। भारत का काफी धन और ऊर्जा इससे निपटने में खर्च होती है। अमेरिका की जुड़वां मीनारों पर हुए आतंकी हमले के बाद जब दुनिया भर के देश आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को वचनबद्ध हुए थे, तब भारत भी उनमें अग्रणी था। इसलिए वह कहीं भी हुए आतंकी हमले के विरोध में खड़ा रहता है।

वह इजराइल और फिलस्तीन के झगड़े को बातचीत के आधार पर निपटाने का पक्षधर है। हमास जैसे आतंकी संगठनों को प्रश्रय देने के पक्ष में वह कभी हो ही नहीं सकता। इस तरह भारत ने पाकिस्तान और चीन को भी संकेत दिया है कि उन्हें चरमपंथ पर दोहरा रवैया छोड़ कर स्पष्ट रूप से इसके विरोध में खड़ा होना चाहिए। कहीं भी दो देशों के मतभेद आतंकवाद के जरिए नहीं मिटाए जा सकते।