बुधवार को राजधानी दिल्ली में नौकरी की तलाश में निकली एक लड़की से चलती कार में बलात्कार की घटना ने चार साल पहले सोलह दिसंबर को एक छात्रा के साथ हुए बर्बर कांड की याद ताजा कर दी। ताजा वाकया यों है। घर लौटने के लिए बस का इंतजार करते हुए उसे एसयूवी कार में बैठे एक युवक ने लिफ्ट देने की पेशकश की। उसने भरोसा कर लिया और इसी चूक ने उसे अपराध का शिकार बना दिया। वाहन पर जाने क्यों गृह मंत्रालय का एक स्टिकर चिपका हुआ था। इसके अलावा, दिल्ली के ही उत्तम नगर इलाके में एक अन्य घटना में तेरह साल की लड़की को उसके ही दोस्तों ने जन्मदिन की पार्टी में बुलाया, बेहोशी की दवा पिला दी और उससे बलात्कार किया। इन घटनाओं से एक बार फिर जाहिर है कि दिल्ली में महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं! निर्भया कांड पर उठे जन-आक्रोश ने पूरे देश को विचलित कर दिया था, और यौनहिंसा से संबंधित कानून में बदलाव हुए थे। पर वास्तव में क्या कोई फर्क आया है?
गौरतलब है कि सोलह दिसंबर, 2012 को दिल्ली में चलती बस में एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार और उसके साथ की गई बर्बरता के चलते मौत के बाद देश भर में फैले असंतोष के बीच सवाल उभरे थे कि इक्कीसवीं सदी में सभ्यता और आधुनिकता का सफर तय करते हुए हमारा समाज कहां तक पहुंच सका है और इसके सोचने-समझने की दिशा क्या है। समाज की विसंगतियों के मामले में यहां की सरकारों की प्राथमिकता और जिम्मेदारी क्या है और कानून-व्यवस्था की कसौटी पर हमारा देश कहां खड़ा है। उस बेहद दुखद घटना के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों के संदर्भ में कानून-व्यवस्था के साथ-साथ समाज के मानस पर भी व्यापक चर्चा हुई थी और मीडिया के जरिए वह आम लोगों तक भी पहुंची थी। उम्मीद की गई थी कि कम से कम अब शायद बदलाव का एक सफर शुरू हो, जिसमें महिलाएं खुद को सभी स्तरों पर बराबर और सुरक्षित महसूस कर सकें।
मगर चार साल बाद भी हालत यह है कि देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं का अकेले निकलना कई तरह के जोखिम के रूबरू होना है। इस दौरान देश भर में महिलाओं के खिलाफ अपराधों का ग्राफ जिस कदर चढ़ा है, उसने निराशा ही पैदा की है। न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिशें, कानून में बदलाव और उसके बाद महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर किए गए तमाम दावों को हर अगले दिन बलात्कार और स्त्री-विरोधी अपराध की दूसरी घटनाएं मुंह चिढ़ाती हैं। आज भी अपने व्यक्तित्व को संवारने से लेकर किसी भी काम से घर की दहलीज से बाहर कदम रखने वाली लड़कियों या महिलाओं को जिस तरह की परिस्थितियों और घटनाओं का शिकार होना पड़ता है, उससे यही लगता है कि न यहां समाज के स्तर पर कुछ बदला है, न कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार की ओर से कुछ ऐसा किया गया है जिससे आपराधिक मानसिकता वाले लोगों के हौसले पस्त हों। फिर, सामाजिक विकास की वैसी नीतियां किसी सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं जिनमें स्त्री-विरोधी मानसिकता को बदलने के कार्यक्रम शामिल हों। सवाल है कि आधी आबादी की पीड़ा के बने रहने की जिम्मेवारी आखिर किस पर आती है? सरकार और शासन आखिर किसलिए होते हैं?

