हालांकि इस बीच कई मौकों पर मुद्रास्फीति की दर में उतार-चढ़ाव बना रहा, लेकिन आय और क्रय शक्ति के संदर्भ में देखें तो महंगाई ज्यादातर लोगों के लिए लगातार एक चुनौती ही है। लेकिन हाल के आंकड़ों के मुताबिक, पहले खुदरा और अब थोक, दोनों ही मामले में महंगाई की दर में आई कमी के रुख ने लोगों को राहत दी है।
गौरतलब है कि अप्रैल में खुदरा महंगाई 4.70 फीसद रही, जो बीते अठारह महीने के दौरान इसका न्यूनतम स्तर है। अब थोक महंगाई भी ऋणात्मक 0.92 फीसद पर आ गई, जो पिछले करीब तीन साल में इसका न्यूनतम स्तर है। जाहिर है, थोक महंगाई की दर शून्य से भी नीचे जाना बाजार में वस्तुओं की आवक के लिहाज से सकारात्मक है और इसका स्वाभाविक असर वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ना चाहिए।
कई बार थोक महंगाई का स्तर तो नीचे जाता है, लेकिन बाजार में वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन थोक के साथ-साथ खुदरा महंगाई के हाल के आंकड़ों में अगर स्थिरता बनी रही, तो इससे आम उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।
यह बदलाव इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि बीते ग्यारह महीने के दौरान आरबीआइ यानी भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से तय खुदरा महंगाई ‘सहनीय स्तर’ से ऊपर ही रही थी। दरअसल, आरबीआइ को इसे चार फीसद तक सीमित रखने का लक्ष्य मिला हुआ है, जिसमें दो फीसद की कमी या बढ़ोतरी की गुंजाइश छोड़ी गई है।
यानी यह दो से छह फीसद तक रहे, तब तक इसे नियंत्रण में माना जाता है, लेकिन इसमें असंतुलन होने पर आरबीआइ को हस्तक्षेप करना पड़ता है। कोरोना महामारी और पूर्णबंदी के असर से बाजार में जो स्थिति बनी थी, उसके बाद खाने-पीने से लेकर ज्यादातर जरूरत की चीजों की कीमतें बहुत सारे लोगों की पहुंच से दूर हो गई थीं। खासतौर पर सब्जियों के दाम ऊंचे स्तर पर बने रहे।
यह सीधे-सीधे लोगों की आय और क्रय शक्ति से जुड़ा मामला था। हालांकि अब भी रोजगार और लोगों की आय के मामले में कोई बड़ा सुधार नहीं दर्ज हो पा रहा है, लेकिन महंगाई में कमी इस चुनौती का सामना करने में मददगार साबित होगा। मुश्किल यह है कि कई बार महंगाई में कमी के आंकड़ों का असर धरातल पर नहीं दिखता है।
गौरतलब है कि बेलगाम महंगाई को काबू में करने के मकसद से भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले करीब एक साल में रेपो दरों में करीब ढाई फीसद की बढ़ोतरी की है। इसका रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली वस्तुओं की कीमतों पर तो कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन इसकी वजह से घर के लिए लिए जाने वाले ऋण सहित सभी तरह के ऋण महंगे हो गए।
अब महंगाई की दरों के नियंत्रण की स्थिति में आने के बाद उम्मीद की जा रही है कि केंद्रीय बैंक की ओर से रेपो दरों में कटौती हो सकती है। मगर महंगाई के मामले में ताजा रुख का हासिल तभी राहत का सबब बन सकता है, जब इसमें स्थिरता रहे और यह आम लोगों की आय और क्रयशक्ति की सीमा के अनुपात में संतुलित रहे।
साथ ही, यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि खुले बाजार में वस्तुओं की कीमतों के समांतर उनकी उपज सुनिश्चित करके आपूर्ति करने वाले किसानों को भी उनके सामान की उचित कीमत मिल सके। अगर किसानों के सामने अनाज या कोई अन्य खाद्य पदार्थ कौड़ियों के भाव बेचने की नौबत आती है और उसी वस्तु की कीमत खुले बाजार में ऊंची होती है तो यह एक तरह से असंतुलित व्यवस्था होगी और इसका असर सभी पर पड़ेगा।
