प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने को लेकर शुरू से गंभीर हैं। इसी मकसद से नोटबंदी का फैसला किया गया। कालेधन को सामने लाने के लिए दूसरे उपाय आजमाए जा रहे हैं। उसी कड़ी में संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले बुलाई सर्वदलीय बैठक में उन्होंने सभी दलों से भ्रष्टाचार रोकने में मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि देश को लूटने वालों के खिलाफ जब कानून अपना काम करता है तो वे सियासी साजिश की बात करके बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ सभी दलों के लोगों को एकजुट होने की जरूरत है। जाहिर है, उनका इशारा लालू प्रसाद यादव और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम के परिजनों के घरों और दफ्तरों पर आयकर विभाग के छापों में हुए खुलासों और फिर उस पर शुरू हुई राजनीति की तरफ था। लालू प्रसाद यादव के परिजनों के ठिकानों पर पड़े छापों में भारी अनियमितता के सबूत मिले हैं। उसके बाद बिहार में महागठबंधन सरकार के भविष्य पर खतरा मंडराने लगा है। लालू प्रसाद यादव की दलील है कि मोदी सरकार उन्हें परेशान करने की नीयत से ऐसा करा रही है। ऐसी ही दलील पी चिदंबरम देते रहे हैं। उनके बेटे कार्ति चिदंबरम पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं।

छिपी बात नहीं है कि राजनेताओं और उनके परिजनों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई निर्णायक कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती कि उन्हें लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। फिर यह भी कि आयकर विभाग के ऐसे छापे अक्सर राजनीति से प्रेरित होते हैं। अब तक के अनुभवों से यही जाहिर है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आती है तो वह अपने प्रतिपक्षी पर नकेल कसने, उसे सबक सिखाने या फिर उस पर राजनीतिक रूप से दबाव बनाने की मंशा से भ्रष्टाचार के मामलों पर जांच शुरू कराती है। फिर जब आरोपी नेता की पार्टी सत्ता में आती है तो वही मामले दबा दिए जाते हैं। अभी तक भ्रष्टाचार के उन्हीं मामलों में राजनेताओं को सजा हो पाई है, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती दिखाई। लालू यादव को चारा घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद ही सजा हो पाई थी। इसी तरह कोयला आबंटन और 2-जी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय सख्ती न बरतता तो शायद उन पर परदा पड़ चुका होता। जांच एजेंसियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने के आरोप पुराने हैं। उनकी निष्पक्षता के अभाव में भी राजनेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले संतोषजनक निर्णय तक नहीं पहुंच पाते।

दरअसल, राजनीतिक भ्रष्टाचार के अधिकतर मामलों में राजनीतिक दलों में एक-दूसरे को बचाने की एक तरह मूक सहमति ही दिखाई देती है। उनके खिलाफ होने वाली जांचों में अधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। ऐसे में प्रधानमंत्री की भ्रष्ट नेताओं से निपटने में एकजुटता दिखाने की अपील समझी जा सकती है। एक आदर्श विचार के तौर पर यह अपील निस्संदेह बेहतरी की उम्मीद जगाती है, मगर व्यावहारिक रूप में यह कितना संभव हो पाएगा, कहना मुश्किल है। यह भी छिपी बात नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोपी दूसरे दलों के नेता जब सत्तापक्ष में शामिल हो जाते हैं, तो उनके खिलाफ जांच एजंसियों की कार्रवाई लगभग शिथिल पड़ जाती है। इसलिए मोदी सरकार को न सिर्फ दूसरे दलों के नेताओं, बल्कि सत्तापक्ष के लोगों पर भी नजर रखने और प्रशासनिक सुधार की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।