केंद्र सरकार ने महानगरों में निजी वाहनों के पंजीकरण के लिए पार्किंग की उपलब्धता को अनिवार्य करने का इरादा जताया है। देखा जा रहा है कि न केवल महानगरों, बल्कि अन्य शहरों और बस्तियों में भी अवैध पार्किंग विकराल समस्या की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। बस्तियों, बाजारों और दफ्तरों के आसपास लोगबाग कहीं भी बेतरतीब ढंग से अपनी गाड़ियां खड़ी कर देते हैं, सड़कें घिरती हैं और तमाम जगहों पर तो लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है। दुर्घटनाएं भी होती हैं। मुहल्लों-कॉलोनियों में तो हालत यह हो गई है कि सड़कों के दोनों तरफ कारों की टेढ़ी-मेढ़ी कतारें लगी रहती हैं, जो कई बार कहासुनी और मारपीट का सबब बन जाती है। अभी पिछले महीने की ही बात है, दिल्ली के विष्णु गार्डन में कार पार्किंग विवाद में एक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी की गोली मारकर हत्या कर दी। फरवरी 2015 में हरिनगर आश्रम क्षेत्र में एक वरिष्ठ नागरिक को कुछ लोगों ने इसी तरह के विवाद में पीट-पीट कर घायल कर दिया था।
सिर्फ दिल्ली में करीब 91 लाख वाहन पंजीकृत हैं, जिनमें करीब तीस प्रतिशत कारें, साठ प्रतिशत मोटर साइकिलें और दो प्रतिशट आॅटो रिक्शा और टैक्सियां हैं। इसके अलावा हर साल करीब चार-पांच लाख वाहन दिल्ली की सड़कों पर और उतर जाते हैं।
अन्य महानगरों और शहरों में वाहनों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। पार्किंग को लेतकर झगड़े और रोडरेज की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। ‘मेरी गाड़ी, तुम्हारी गाड़ी से महंगी’ वाला भाव भी समाज में तेजी से बढ़ रहा है। अक्टूबर में बिहार की राजद विधायक के बेटे ने एक छात्र की सरेआम रोडरेज में गोली मारकर हत्या कर दी थी। दिल्ली में अभी पिछले पखवाड़े न्यू अशोक नगर इलाके में एक प्रापर्टी डीलर ने एक व्यापारी की सिर्फ इसलिए गोली मार कर हत्या कर दी, क्योंकि उनकी कारें आपस में कहीं छू गई थीं। इन स्थितियों को देखते हुए अगर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने पार्किंग की उपल्बधता होने पर ही वाहनों के पंजीकरण का प्रस्ताव किया है, तो यह स्वागत-योग्य है। कई देशों में ऐसा नियम लागू है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने दो दिन पहले कहा कि उनका मंत्रालय, भूतल परिवहन मंत्रालय से विचार-विमर्श कर चुका है और जल्द ही इस दिशा में कोई नियमावली तैयार की जाएगी। अगर सरकार अपने इरादे को अमल में लाती है तो गाड़ियों की अनाप-शनाप खरीद-फरोख्त पर भी रोक लगेगी।
गाड़ियों का बढ़ता काफिला पर्यावरण के लिहाज से भी खतरनाक है। पर्यावरणविद तो बहुत पहले से और अब तो न्यायालय वाहनों को सीमित करने में ही भलाई देख रहे हैं। दिल्ली सरकार ने कुछ महीने सम-विषम का फार्मूला लागू किया था, पर वह फौरी प्रयोग भर था। अभी तक हिमाचल ही ऐसा राज्य है, जहां वाहनों की खरीद के लिए पार्किंग की जगह होना अनिवार्य बनाया गया है। हालांकि यह राज्य सरकार के निर्णय के बजाय उच्च न्यायालय के दखल से हुआ। उच्च न्यायालय ने 2015 में अवैध पार्किंग की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए यह आदेश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार को इस दिशा में नियमावली तैयार करनी पड़ी। आदेश के मुताबिक वाहन का पंजीकरण करने से पहले संबंधित थाने से पार्किंग उपलब्धता का प्रमाणपत्र लेना पड़ता है, इसके बाद ही वाहन का पंजीकरण होता है। लेकिन पूरे देश के पैमाने पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा।

