जब बराक ओबामा पहली दफा अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए, तो इसे इतिहास की सबसे बड़ी खाई पाटने वाली घटना कहा गया। अमेरिका ने दूसरी बार भी उन्हें चुना। लगा कि श्वेत-अश्वेत का द्वंद्व अमेरिका में अतीत की बात हो गई है। यह विडंबना ही है कि जब राष्ट्रपति के तौर पर ओबामा के कार्यकाल को पूरा होने में थोड़ा ही समय रह गया है, अमेरिका में श्वेत और अश्वेत के बीच तनाव चरम पर दिखता है। खुले और बेहद उदार समाज होने की उसकी छवि पर आंच आई है। वहां के टेक्सास प्रांत के डलास में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान छिप कर पुलिस पर चलाई गई गोलियों से पांच पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।
कुछ अन्य पुलिसकर्मी घायल हैं। इस वाकये ने अमेरिका को दहला दिया है। अमेरिका में 2001 के बाद यह पुलिस पर सबसे बड़ा हमला है। पर ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि हमला पुलिस के हाथों दो अश्वेत नागरिकों की मौत के बाद हुआ। पांच जुलाई को लूसियाना में पुलिस ने एक अश्वेत को हथियार रखने के शक पर रोका। कहासुनी और हाथापाई के बाद उसे पुलिसवालों ने जमीन पर गिरा दिया और उस पर दनादन कई गोलियां दाग दीं। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इसके दूसरे ही रोज मिनिसोटा में अपनी महिला मित्र के साथ कार से जा रहे एक अश्वेत को रोक कर पुलिस ने ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने को कहा। वह संबंधित प्रमाणपत्र जेब से निकाल ही रहा था कि पुलिस को लगा कि वह पिस्तौल निकाल रहा है। फिर पुलिस ने गोली मार दी और वहीं उसकी जान चली गई। ये दोनों मामले इसी बात के उदाहरण हैं कि अश्वेतों के प्रति पुलिस किस तरह पेश आती है, और कई बार महज शक या गफलत में फौरन गोली चला देती है।
इन दोनों घटनाओं को लेकर गुस्सा भड़कना स्वाभाविक था। पर उनके जो विरोध-प्रदर्शन हुए वे पूरी तरह शांतिपूर्ण थे। जिन संदिग्ध व्यक्तियों ने डलास में पुलिस पर गोलियां चलार्इं वे समझते होंगे कि उन्होंने अश्वेतों की तरफ से बदला लेकर सही किया है, पर वास्तव में उन्होंने अश्वेत समुदाय का नुकसान ही किया है। यह आम भावना थी कि अश्वेतों के विरोध-प्रदर्शन जायज हैं; खुद राष्ट्रपति ने उनके प्रति पुलिस के बर्ताव को भेदभाव करार दिया था, और आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की जरूरत बताई थी। पर पुलिस पर घात लगा कर किए गए हमले की वजह से पुलिस के प्रति नाराजगी का माहौल पुलिस के प्रति सहानुभूति में बदल गया।
यही नहीं, इस बात की आशंका भी है कि पुलिस की ओर से अश्वेतों को रोके जाने, तलाशी लिये जाने, उन पर शक किए जाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। अमेरिका में अश्वेतों के आंदोलन ने समानता की दिशा में महान उपलब्धियां अहिंसक तरीकों से हासिल कीं। उस विरासत को पलीता लगाने वाले अश्वेतों का भला नहीं कर सकते। पर श्वेत समुदाय को भी सोचना होगा कि डलास में जो कुछ हुआ वह आकस्मिक रूप से फूट पड़ा लावा भले लगे, पर इस हिंसा की जड़ें गहरी हैं। अमेरिका में बंदूकों की व्यापक मौजूदगी भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। यों ओबामा बंदूक-नियंत्रण के पक्ष में हैं, मगर बंदूक लॉबी या हथियार उद्योग के प्रभाव के चलते सख्त नियम-कायदे नहीं बन पा रहे हैं। पर अब अमेरिका को बंदूक रखने के अधिकार पर अंकुश लगाने का कदम उठाना ही चाहिए।

