Child Education: Jansatta Editoral: हमारे समाज में आज भी यह धारणा बनी हुई है कि डर, डांट और मारपीट से बच्चे के भीतर कमियों में सुधार लाया जा सकता है। पढ़ाई के मामले में कई बार विद्यालयों और यहां तक कि घर-परिवार में भी इसी तरह के प्रयास किए जाते हैं। हालांकि, शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के दौरान बच्चों के साथ आक्रामक व्यवहार पर कानूनी रूप से पाबंदी है, फिर भी ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं।
विद्यालय में अगर किसी बच्चे के साथ मारपीट होती है, तो उसे उम्मीद और भरोसा होता है कि उसके अभिभावक सुरक्षा के लिए आगे आएंगे। मगर जब कोई अभिभावक ही पढ़ाई के लिए अपने बच्चे से मारपीट करने लगे, तो उसे किस तरह की मानसिकता कहा जाएगा।
फरीदाबाद की घटना ने उठाए सवाल
हरियाणा के फरीदाबाद में हाल ही में एक ऐसी ही घटना सामने आई, जिसने सामाजिक एवं पारिवारिक संवेदनाओं और सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खबरों के मुताबिक, एक पिता ने अपनी चार वर्षीय बेटी को घर पर पढ़ाते समय पचास तक गिनती न लिख पाने के कारण इस कदर पीटा कि उसकी मौत हो गई।
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यह गंभीर चिंता का विषय है कि इस तरह की धारणा कैसे बना ली जाती है कि भय या मारपीट से बच्चों में पढ़ने-लिखने की क्षमता बढ़ जाती है। जबकि विभिन्न शोध और अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि किसी भी तरह की आक्रामकता का बच्चों पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे बच्चों में याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, जिससे वे पढ़ाई में और भी ज्यादा पिछड़ जाते हैं।
मारपीट बन सकती है मनोविकार
कई बार बच्चों के भीतर ऐसा खौफ पैदा हो जाता है, जो आगे चलकर अवसाद या अन्य तरह के मनोविकार का कारण बन सकता है। ऐसे में इस बात का खयाल रखना बेहद जरूरी है कि बच्चों को किसी भी रूप में हिंसक प्रवृत्ति का सामना न करना पड़े।
अगर कोई बच्चा किसी एक तरीके से नहीं समझ पा रहा है, तो उसे दूसरे मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाने की कोशिश की जानी चाहिए, क्योंकि सुरक्षित, स्नेहपूर्ण तथा भय एवं तनावमुक्त माहौल में ही बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास संभव हो पाता है। कौन हैं नोएडा अथॉरिटी के नए CEO कृष्णा करुणेश? युवराज मेहता केस के बाद हुई है नियुक्ति
