गुजरात में दंगों के दौरान क्षतिग्रस्त हुए धर्मस्थलों की मरम्मत के लिए मुआवजा देने के हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मंतव्य बिल्कुल स्पष्ट है और उसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना है कि क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों की मरम्मत के लिए राज्य सरकार एक निश्चित मुआवजा देने को तैयार है। ऐसे में करदाताओं से जुटाई गई राशि के बड़े हिस्से को किसी धर्मविशेष के पूजास्थलों के जीर्णोद्धार या रखरखाव में खर्च करने से अनुच्छेद 27 के प्रावधानों का उल्लंघन होगा, जिसका उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखना है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चंद्र पंत के पीठ ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट का आदेश कानून के मुताबिक नहीं है, इसलिए गुजरात सरकार की याचिका स्वीकार की जाती है। अदालत ने कहा कि धार्मिक स्थलों और संपत्तियों को संरक्षण देना धर्मनिरपेक्षता का अहम पहलू है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना ही चाहिए और लोगों के बीच सहिष्णुता कायम रहनी चाहिए, लेकिन सरकार को धर्मस्थलों की मरम्मत का निर्देश नहीं दिया जा सकता वरना इससे धर्मनिरपेक्षता का ताना-बाना प्रभावित होगा। करदाताओं का धन धार्मिक ढांचों के जीर्णोद्धार के लिए नहीं दिया जा सकता है। माना जा रहा है कि इस आदेश का दूरगामी नतीजा होगा।

गौरतलब है कि गोधरा कांड के बाद 2002 में गुजरात में भड़के दंगे के दौरान करीब पौने छह सौ धार्मिक ढांचों में तोड़फोड़ की गई थी। द इस्लामिक रिलीफ कमेटी आॅफ गुजरात ने गुजरात हाईकोर्ट में 2003 में एक याचिका दाखिल करके क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों की मरम्मत के लिए सरकार से मुआवजा दिलाने की मांग की थी। 2012 में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मुआवजा देने का आदेश दिया था। याचिका के मुताबिक दंगाइयों ने 567 धार्मिक ढांचों को अपना निशाना बनाया था, जिनमें से 545 ढांचे मुसलिम समुदाय से जुड़े थे। इनमें मस्जिद, कब्रिस्तान, खानकाह तथा अन्य धार्मिक स्थल शामिल थे। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर याचिकाकर्ता कमेटी ने भी संतोष जताया है, जबकि गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह सरकार की नीतियों की जीत है। गुजरात सरकार की खुशी स्वाभाविक है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट अतिरिक्त महान्यायवादी तुषार मेहता के इस तर्क संतुष्ट दिखा कि गुजरात सरकार ने क्षतिग्रस्त किसी भी निर्माण के लिए पचास हजार रुपए की एकमुश्त रकम देने की नीति बनाई है। अदालत ने कहा कि जो मुआवजा लेना चाहते हैं वे आठ हफ्ते के भीतर राज्य सरकार के समक्ष अपना आवेदन दे सकते हैं।

इससे पहले गुजरात सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि उसने 2001 में आए भूकम्प के दौरान क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों को भी कोई मुआवजा नहीं दिया था, क्योंकि संविधान में प्रावधान है कि करदाता से किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए कर वसूली नहीं की जा सकती। हालांकि प्रतिपक्षी इस्लामिक रिलीफ कमेटी की ओर से यह दलील दी गई कि किसी वर्चस्वशाली समूह द्वारा किसी कमजोर तबके के पूजास्थलों को अगर क्षति पहुंचाई जाती है तो इसका जीर्णोद्धार करना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसा करना किसी धर्म को प्रोत्साहन देना नहीं है। सरकार अगर तोड़े-फोड़े गए धर्मस्थलों को ठीक नहीं कराती तो यह अनुच्छेद 21 ए में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का हनन होगा। इस पर न्यायालय ने कहा कि सरकार ने मुआवजा देने की बात मान ली है।