भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को लेकर अक्सर आलोचना के, यहां तक कि घोर निराशा के स्वर सुनाई देते हैं। वजह यह है कि लोगों को रोज राजनीतिक पतनशीलता के दर्शन और अनुभव होते हैं। ऐसा नहीं कि अब राजनीति में अच्छे लोग नहीं बचे हैं, या इसमें कोई भला आदमी अब नहीं आता। राजनीति में अच्छे लोग अब भी हैं और किसी आदर्शवाद से प्रेरित होकर राजनीतिक कर्म का रास्ता अख्तियार करने वाले अब भी मिल जाएंगे। लेकिन वे राजनीति की मुख्यधारा नहीं हैं। जो मुख्यधारा है उसके बारे में आम धारणा यही है कि वह पतित और भ्रष्ट है। अधिकतर राजनीतिकों का मकसद बस किसी तरह चुनाव जीतना और सत्ता में जाना हो गया है। चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, और सत्ता में आने पर पैसा बनाने के सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं। सत्ता में जाने या किसी और तरह के निजी फायदे के लिए, कभी भी पाला बदल लेना आम हो गया है। ज्यादातर पार्टियां परिवारों की जागीर होकर रह गई हैं। ऐसे में, राजनीति को नैतिक तकाजों की याद दिलाने वाली बात हो, और वह भी निर्वाचन आयोग की तरफ से, तो यह रेगिस्तान के बीच एक नखलिस्तान की तरह ही लगता है।
निर्वाचन आयुक्त ओमप्रकाश रावत ने गुरुवार को कहा कि किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना आज राजनीति का सामान्य लक्षण हो गया है; अगर कोई चुनाव जीत जाता है तो उसने चाहे जितने गलत और चाहे जितने क्षुद्र तरीके अपनाए हों, चाहे जिन हथकंडों का सहारा लिया हो, उसे कुछ भी गलत नजर नहीं आता, उसे कोई अपराध-बोध नहीं सताता, वह मान कर चलता है कि उसके गुनाहों पर परदा पड़ गया है; जबकि लोकतंत्र तभी फूलता-फलता है जब चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी हों। रावत ने ये बातें गुरुवार को दिल्ली में एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) की तरफ से आयोजित राजनीतिक एवं चुनाव सुधार विषयक परिचर्चा को संबोधित करते हुए कहीं। क्या उनकी इस पीड़ा के पीछे राज्यसभा के लिए गुजरात में हुए चुनाव का अनुभव भी रहा होगा? जो हो, इस मौके पर उन्होंने पेड न्यूज को ऐसा चुनावी अपराध माने जाने की भी वकालत की, जिसके लिए कम से कम दो साल की सजा होनी चाहिए। रावत ने प्रस्तावित इलेक्टोरल बांड के प्रावधान पर आयोग के एतराज को दोहराते हुए जन प्रतिनिधित्व कानून में उस प्रस्तावित संशोधन की भी आलोचना की, जिसके तहत राजनीतिक दलों को छूट होगी कि वे चाहें तो इलेक्टोरल बांड के रूप में चंदा देने वालों के नाम न बताएं। रावत की चिंता वाजिब है।
अगर प्रस्तावित संशोधन लागू हो गए तो हमारी राजनीति को चंदे के जरिए प्रभावित करने की कॉरपोरेट जगत की ताकत और बढ़ जाएगी। एक ताजा अध्ययन बताता है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में कॉरपोरेट जगत का हिस्सा बढ़ता गया है। अभी कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा दे सकने की एक कानूनी सीमा तय है। जब उन्हें इलेक्टोरल बांड के रूप में असीमित चंदा दे सकने की छूट होगी और इसका ब्योरा छिपाए रखने की इजाजत भी होगी, तो राजनीतिक दलों पर किसका अंकुश होगा- जनता और कार्यकर्ताओं का, या धनकुबेरों का? रावत ने ये सवाल उठाते हुए कहा कि राजनीति में हर ओर और हर स्तर पर हावी विकृतिकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए पार्टियों से लेकर मीडिया और नागरिक जमात तक, सब तरफ से प्रयास होने चाहिए। निहित स्वार्थों के नक्कारखाने में क्या यह आवाज सुनी जाएगी!

