उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर विवाद पहले भी कभी-कभार उठे थे, मगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से अधिकारों को लेकर बराबर रस्साकशी की हालत रही है। इसलिए इस मामले में निर्णायक स्पष्टता की जरूरत जितनी आज है, उतनी शायद पहले नहीं थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल अगस्त में फैसला सुनाया था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं। जाहिर है, यह फैसला ‘आप’ सरकार को रास नहीं आ सकता था। लिहाजा, उसने इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी। सर्वोच्च अदालत ने मसले की गंभीरता और प्रकृति को देखते हुए उचित ही इसे संविधान पीठ को सौंप दिया। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले संविधान पीठ ने सुनवाई के पहले चरण में मोटे तौर पर वही कहा है जो उच्च न्यायालय ने कहा था, यानी यह कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं; संविधान ने दिल्ली सरकार की सीमाएं तय कर रखी हैं और उसे उसी दायरे में रहना होगा।

सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी से लगता है कि उसने दिल्ली सरकार की याचिका सिरे से खारिज कर दी है और उच्च न्यायालय के फैसले को ही दोहराया भर है। पर ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। एक तो इस कारण कि सर्वोच्च अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, अभी और सुनवाई होनी है। दूसरे, उसने उच्च न्यायालय के फैसले से थोड़ा भिन्न रुख अख्तियार करते हुए दोनों पक्षों को, यानी दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को अपनी हदों में रहने की हिदायत दी है। जहां केजरीवाल सरकार को यह याद दिलाया है कि दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश है, इसलिए यहां राज्य सरकार के अधिकार अन्य राज्य सरकारों जैसे नहीं हो सकते, वहीं उपराज्यपाल को भी कहा है कि वे फाइलों पर कुंडली मारे बैठे नहीं रह सकते, उन्हें एक समय-सीमा के भीतर केंद्र के पास फाइलें भेजनी होंगी। भूमि, पुलिस और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों को छोड़ कर दिल्ली विधानसभा कानून बना सकती है, मगर उस पर उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी है। इन टिप्पणियों की बिना पर फिलहाल यह दावा करना मुश्किल है विवाद निपट गया है, या स्थायी रूप से निपट ही जाएगा। उपराज्यपाल प्रशासनिक रूप से केंद्र के प्रतिनिधि हैं और विधायी रूप से संसद के। पर चाहे नजीब जंग रहे हों या अनिल बैजल हों, केजरीवाल सरकार से टकराव चलता ही रहा है। इसमें कभी एक पक्ष ने अड़ियल रुख अपनाया और सीमा लांघी, तो कभी दूसरे पक्ष ने।

पहले के टकराव छोड़ दें, तो मौजूदा उपराज्यपाल अनिल बैजल के समय भी अतिथि शिक्षकों को नियमित करने से लेकर डीटीसी के किराए में कमी करने तक, दिल्ली सरकार के कई फैसलों पर टकराव की नौबत आ चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि विवाद की सूरत में दोनों पक्षों को राष्ट्रपति की शरण में जाना चाहिए। प्रावधानों के मुताबिक यह सलाह उचित हो सकती है, पर इससे हल क्या निकलेगा? राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर निर्णय लेते हैं और सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री, दोनों फरियादी हों, तो राष्ट्रपति की कृपा किस पर होगी। फिलहाल यह सवाल अनुत्तरित है कि दिल्ली में, जो कि पूर्ण राज्य नहीं है मगर जिसके पास विधानसभा है, उपराज्यपाल के लिए राज्य मंत्रिमंडल की सलाह, अगर कोई संवैधानिक विसंगति या अड़चन न हो, तो वह क्या मायने रखती है? क्या उपराज्यपाल उसे मानेंगे ही, या यह उनके पूर्ण विवेकाधिकार का विषय है? क्या यह उम्मीद की जाए कि इस मामले में चली आ रही अस्पष्टता और तमाम शंकाएं जल्दी ही दूर हो जाएंगी।