किसी भी राष्ट्र के संतुलित विकास के लिए आर्थिक समानता का होना बेहद जरूरी है। जब तक सभी नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं होंगी, तब तक विकास के तमाम दावे अधूरे ही साबित होंगे। मगर, चिंताजनक बात है कि दुनिया भर में आर्थिक असमानता का दायरा बढ़ता जा रहा है। इससे न केवल आर्थिक अस्थिरता बढ़ रही है, बल्कि आमजन की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी आधारभूत जरूरतों तक पहुंच भी सीमित हो रही है। इससे कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है।

विश्व आर्थिक मंच की नई सर्वेक्षण रपट में भी इस बात को उजागर किया गया है। इसमें कहा गया है कि दुनिया भर के युवा असमानता से चिंतित हैं। मगर इसकी आलोचना करने के बजाय, वे इसमें बदलाव चाहते हैं। सवाल है कि आखिर अमीर-गरीब के बीच खाई घटने की बजाय बढ़ क्यों रही है? क्या शासन और प्रशासन को इस बात का भान नहीं है कि इस असमानता के परिणाम न केवल किसी एक देश, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकते हैं?

इसमें दोराय नहीं कि आर्थिक असमानता के मामले में भारत भी पीछे नहीं है। विश्व असमानता पर हाल में जारी की गई एक रपट के मुताबिक, देश की कुल संपत्ति का करीब चालीस फीसद हिस्सा महज एक फीसद लोगों के पास है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में आर्थिक असंतुलन का स्तर कहां पहुंच गया है। युवा वर्ग भी इससे प्रभावित हो रहा है और वह व्यवस्था में बदलाव तो चाहता है, लेकिन इसके लिए उसे सही मंच और अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

विश्व आर्थिक मंच की रपट में कहा गया है कि सर्वेक्षण के दौरान सत्तावन फीसद युवाओं ने इस असमानता पर गंभीर चिंता जताई है। आर्थिक असमानता बढ़ने की चेतावनी पहले भी दी जाती रही है, लेकिन इस पर गंभीरता दिखाने की पहल दुनिया के किसी कोने में नजर नहीं आई है। ऐसे में इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब किसी देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा चंद लोगों के हाथों में आ जाएगा, तो उसका परिणाम क्या होगा।