भारतीय राजनीति में भाषा की गिरावट राष्ट्रीय चिंता का सबब बन चुकी है। बल्कि कहें कि यह राष्ट्रीय शोक का विषय बन चुकी है। विशेषकर चुनावी समर में तो नेताओं के परस्पर संवाद की भाषाई गिरावट रसातल की ओर जाती नजर आ रही है। भले ही आम दिनों में असहमति-जन्य बहस के दौरान संसद के ‘वेल’ में नजर आने वाली भाषाई शर्म, हो-हल्ले की ओट में दब-छुप कर अपनी लाज ढंक लेती हो मगर चुनावी मौकों पर की जाने वाली अप्रिय बयानबाजी से राजनीतिक मर्यादा कभी अपना दामन नहीं बचा सकती। इन कटु-संवादों के दूरगामी दुष्प्रभाव लोकतंत्र पर मारक असर छोड़ कर भी कभी खत्म नहीं होने वाले हैं। तभी तो इस प्रदूषण ने देश के राजनीतिक और मीडियाई वातावरण को गले-गले तक दूषित बना दिया है।
वैसे, राजनीति के इन परस्पर अशिष्ट संवादों की महज भाषा की गिरावट के रूप में शिनाख्त नहीं की जानी चाहिए। यह परिदृश्य की अधूरी व्याख्या ही कही जाएगी। असल में यह आपसी बौखलाहट की प्रतिद्वंद्वी गिरावट वाली राजनीति का दौर है जिसमें परस्पर सहिष्णुता के प्रति माराकाटी-सा निर्मम नजारा है। इसमें पक्ष को विपक्ष और विपक्ष को पक्ष किसी करवट स्वीकार्य नहीं हो रहा। या कहें कि आरोप को प्रत्यारोप और प्रत्यारोप को आरोप की मौजूदगी फूटी आंख नहीं सुहा रही। अजीब अविश्वास का दौर है जहां अविश्वास को विश्वास का संबल तो छोड़िए, स्वयं अविश्वास की पक्षकारी सत्ता पर भी भरोसा नजर नहीं आ रहा। राजनीति इतनी गिरेगी यह तो अंदेशा था, मगर इस गति से और इतनी बेसब्री होकर जमींदोज होगी, यह भरोसा किसी को कतई नहीं था।
देखा जा रहा है कि नेताओं के अप्रिय शब्दों की अराजक पत्थरबाजी ने सहिष्णु लोकतंत्र को लहूलुहान कर दिया है। अब कातर लोकतंत्र किससे कहे कि उसके ये पूत, कपूत होकर उसकी बदनामी के कपोत शर्मिंदगी के खुले आसमान में बेखौफ होकर उड़ा रहे हैं? लोकतंत्र को यह भी पता नहीं कि वह कौन-सा छली शैतान नेताओं के मुंह में आकर बैठ जाता है जो वे सत्ता के लिए आपसी सद्भावना तक का गला घोंटने पर उतारू हो जाते हैं? क्या वजह है कि कोई भी नेता शिष्टता की महीन रेखा को अपनी शुचिता के फलसफे का ‘एलओसी’ तक मानने को तैयार नहीं है?
वैसे जनता खूब जानती है कि आज एक-दूसरे को कोसने वाले ये नेता कल हम-पियाला हम-निवाला होकर सादगी से अपना सहचर्य शेयर करने से भी नहीं चूकने वाले। मगर इस सच्चाई के भान के बावजूद जो सवाल जनता के मन में राजनीति के प्रति घृणा के बीज बन कर अनजाने ही जड़ें जमा रहे हैं वे कब नफरतों के दुस्साहसी पौधे बन कर विश्वास की जमीन को तहस-नहस कर देंगे, यह बात कोई नहीं जानता।
’राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर</p>
