दिल्ली में उपराज्यपाल के पद पर पूर्व नौकरशाह अनिल बैजल की नियुक्ति होने के साथ ही जहां अटकलों को विराम लग गया है, वहीं राज्य सरकार के साथ उनके रिश्तों के संबंध में कयासबाजी भी शुरू हो गई है। अठारह महीने का कार्यकाल बाकी होने के बावजूद नजीब जंग ने पिछले हफ्ते अचानक इस पद से इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रपति ने उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया है और इक्कीसवें उपराज्यपाल के तौर पर बैजल के नाम की घोषणा भी हो गई है।
विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के ट्वीट के बाद यह खबर आम हुई। बैजल के पास शासन और प्रशासन में काम करने का लंबा अनुभव है। वे 2006 में शहरी विकास मंत्रालय के सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इससे पहले वे वाजपेयी सरकार में गृह सचिव और डीडीए के उपाध्यक्ष जैसे अहम पदों पर रहे थे। मनमोहन सरकार की 60 हजार करोड़ रुपए की महत्त्वाकांक्षी योजना जेएनएनयूआरएम को मूर्त रूप में देने में भी उनका अहम योगदान रहा। लेकिन उनकी असल परीक्षा शायद अब होगी। क्योंकि पूर्व उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के रिश्ते लगातार कटु से कटुतर होते गए थे।
आए दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और जंग के बीच आपसी खींचतान, अधिकारों को लेकर एक दूसरे के विरुद्ध बयानबाजी और दूसरे कई तरह के विवाद मीडिया में सुर्खियां बनते रहे थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली की जनता को पुराने खटासों की कहानी अब नहीं सुनने को मिलेगी। हालांकि यह अंदेशा भी कम नहीं है कि जाने कब तनातनी के बादल फिर घिर आएं? वास्तव में दिल्ली सरकार और पूर्व उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर कई बार संवैधानिक संकट भी पैदा हुआ। आखिरकार मामला अदालत में पहुंचा और इसी साल अगस्त में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि उपराज्यपाल ही प्रशासनिक प्रमुख हैं; वे मंत्रियों के सुझाव पर काम करने को बाध्य नहीं हैं।
इस फैसले को आम आदमी पार्टी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सितंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक चुनी हुई सरकार के पास कुछ तो अधिकार होने चाहिए, ताकि वह काम कर सके। हालांकि इस मामले में अठारह जनवरी को फिर सुनवाई होनी है, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने अपना रुख कुछ हद तक स्पष्ट कर दिया है।
केजरीवाल सरकार यह आरोप लगाती रही है कि उपराज्यपाल एक चुनी हुई सरकार को नजरअंदाज करके तानाशाही रवैया अख्तियार करते रहे हैं। यहां कि दिल्ली सरकार को अपनी मर्जी से अपना मुख्य सचिव तक नहीं नियुक्त करने दिया गया। ऐसा शायद पहले कभी नहीं हुआ। दरअसल, यह केवल संवैधानिक विवाद का मसला नहीं था। विवाद के पीछे एक बड़ा राजनीतिक कारण भी था। शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं, तो अधिकांश समय केंद्र में उन्हीं की पार्टी की सरकार थी।
मगर दिल्ली की कमान आम आदमी पार्टी के हाथ में आते ही पुराना समीकरण बदल गया। चूंकि उपराज्यपाल केंद्र के अधीन काम करता है, इसलिए अगर केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सरकार हो, तो इसका असर उपराज्यपाल और राज्य सरकार के बीच तल्खी के रूप में आ सकता है। लेकिन सर्वोच्च अदालत के रुख को देखते हुए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के अधिकारों को लेकर संतुलन का रास्ता निकलेगा।
