पिछले कुछ वर्षों में साइबर धोखाधड़ी का जाल इतना व्यापक हो गया है कि कब कौन ठगी का शिकार हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस तेजी से इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। सवाल है कि आधुनिक तकनीक के इस दौर में साइबर ठगी पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? जालसाजी में फंसकर लोगों के जीवन भर की जमा पूंजी हाथ से निकल जाती है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में तो पीड़ित को मानसिक यातना भी झेलनी पड़ती है।
इस तरह के अपराधों पर लगाम लगाने के प्रयासों के तहत केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के विशेष सचिव की अगुआई में अंतर-मंत्रालयी समिति बनाई है। साथ ही यह भी कहा है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ से संबंधित सभी मामलों की जांच अब सीबीआइ करेगी। मगर, सरकार का यह कदम तभी कारगर साबित होगा, जब साइबर धोखेबाजों को किसी वारदात को अंजाम देने से पहले ही रोक दिया जाए।
गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने अपने एक आदेश में ‘डिजिटल अरेस्ट’ की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा था कि सरकार को इससे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए। दरअसल, देश में आनलाइन लेन-देन बढ़ने के साथ ही साइगर ठगी के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आम नागरिक और खासकर बुजुर्ग नई तकनीक और आनलाइन जोखिम से अनजान हैं। जरा सी चूक होने पर लाखों रुपए जालसाजों के हाथ में चले जाते हैं। चिंता की बात यह है कि साइबर धोखाधड़ी के लिए आए दिन नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।
ऐसे में जरूरी है कि आम लोगों को डिजिटल साक्षरता के जरिए व्यापक स्तर पर जागरूक किया जाए। मसला सिर्फ इस तरह के मामलों की जांच का नहीं है, बल्कि जरूरत इस बात की है कि अपराध होने से पहले ही उसे रोक दिया जाए। जब तक साइबर अपराधियों की धर-पकड़ के लिए मजबूत तंत्र स्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक इस ऐसे मामलों पर पूरी तरह रोक लगा पाना संभव नहीं हो पाएगा।
