बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और उसकी गतिविधियों में सुधार के मसले पर नजर रखे हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार यहां तक कहा था कि आप लोग सुधर जाएं, नहीं तो हम अपने आदेश से इसे सुधार देंगे। लेकिन बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को मानना जरूरी नहीं समझा और एक तरह से अवमानना करने पर उतारू रहे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के इन दोनों उच्चपदस्थ लोगों को उनके पद से बर्खास्त करने का फैसला सुनाया है तो स्वाभाविक है। भारतीय क्रिकेट को राजनीतिकों की महत्त्वाकांक्षाओं का खेल होने से बचाने के लिहाज से भी यह एक जरूरी फैसला है। गौरतलब है कि अदालत ने पिछले साल अठारह जुलाई को दिए अपने फैसले में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सत्तर साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों के पदाधिकारी बनने पर रोक लगा दी थी।

जाने क्यों बीसीसीआई के हटाए गए अध्यक्ष और सचिव यह समझ नहीं सके कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल करना उनकी जिम्मेदारी और बाध्यता, दोनों है। दोनों ने राज्य क्रिकेट संघों का हवाला देकर सुधारों को लागू न करने का बहाना बनाए रखा। यही नहीं, कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को चेतावनी देते हुए कहा था कि झूठा हलफनामा दायर करने के लिए उन्हें सजा क्यों न दी जाए! इसके अलावा, उन पर सुधार प्रक्रिया को बाधित करने का भी आरोप था। सवाल है कि आखिर अनुराग ठाकुर के अपने पद पर बने रहने की जिद और उसके लिए अदालत तक में झूठ बोलने की क्या वजह हो सकती है! दरअसल, जैसे-जैसे क्रिकेट एक लोकप्रिय खेल से अकूत पैसे के तमाशे में तब्दील होता गया है, इसके संचालन के उच्च पदों पर कब्जा जमाने की होड़ बढ़ती गई है। इसमें सबसे ज्यादा कामयाबी ऊंचे राजनीतिक रसूख वाले लोगों को मिली, जो राज्य खेल संघों से लेकर बीसीसीआई तक के शीर्ष पदों पर कब्जा जमा कर अपने मुताबिक उसे चलाने लगे।

इससे सबसे ज्यादा नुकसान क्रिकेट संघों के प्रशासनिक पहलू को हुआ। इनमें वैसे लोगों को जगह नहीं मिल सकी जो पेशेवर खिलाड़ी रहे हैं और क्रिकेट से जुड़े सारे पहलुओं को समझते हैं। इसका स्वाभाविक असर खिलाड़ियों के चयन, उनके प्रशिक्षण, खेलों के आयोजन और उनके प्रसारण के अधिकार आदि देने की स्थितियों पर पड़ा। यह कोई छिपी बात नहीं है कि जब से क्रिकेट में आइपीएल प्रतियोगिताओं की शुरुआत हुई है, उसमें खिलाड़ियों की खुली नीलामी से आगे बढ़ते हुए स्पॉट मैच फिक्सिंग तक के मामले सामने आने लगे। इन सब पर लगाम लगाने के बजाय बीसीसीआई सहित तमाम खेल संघों के पदाधिकारियों की रुचि पद पर कब्जा बनाए रखने में रही। सवाल है कि क्या क्रिकेट में हो रहे पैसे के खेल में परदे के पीछे कुछ और लोगों का हिस्सा भी बन रहा था? अगर नहीं तो आखिर किन वजहों से एक लोकप्रिय खेल को पैसे बनाने के खेल में तब्दील किया जाता रहा? सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का संदेश साफ है कि खेल संगठनों के समूचे ढांचे में वैसे ही लोग मौजूद हों जो इसे खेल बनाए रखने के प्रति अपनी जिम्मेदारी निबाहें।