उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ताजा बयान ने राज्य में विधानसभा चुनावों के मद््देनजर नए समीकरण बनने की संभावना के संकेत दिए हैं। बीते शुक्रवार को उन्होंने कहा कि कांग्रेस के साथ गठबंधन से उन्हें कोई परहेज नहीं है। कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पिछले दिनों सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हुई मुलाकातों के चलते पहले से ही दोनों पार्टियों के बीच गठजोड़ की अटकलें लगाई जा रही थीं। अब अखिलेश के बयान से जाहिर है कि वह चर्चा निराधार नहीं थी। यों गठबंधन के बारे में, जैसा कि अखिलेश भी कह चुके हैं, अंतिम फैसला मुलायम सिंह करेंगे। पर बात चल रही है तो जरूर दोनों पार्टियों की कुछ मजबूरी होगी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमजोरी किसी से छिपी नहीं है। वह सत्ताईस बरसों से सत्ता से बाहर तो है ही, कई चुनावों में लाख जतन करने पर भी मुख्य मुकाबले में आने में वह कामयाब नहीं हो सकी। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की हैसियत में आई गिरावट बहुत कुछ उत्तर प्रदेश में उसकी कमजोरी की देन है, जहां लोकसभा की अस्सी सीटें हैं।
पार्टी ने राहुल गांधी की खाट यात्रा से काफी उम्मीदें बांधी थीं, पर ये यात्राएं कोई खास असर नहीं छोड़ पार्इं। इसलिए अब कांग्रेस को लग रहा होगा कि अकेले चुनाव लड़ने पर वह मुख्य मुकाबले से बाहर हो सकती है। फिर, बिहार के महागठबंधन के अनुभव ने भी उसे सिखाया होगा कि गठजोड़ में ही भलाई है। अलबत्ता भाजपा को पटकनी देने के लिए बिहार जैसा प्रयोग उत्तर प्रदेश में संभव नहीं दिख रहा। बसपा अपनी ही राह चलेगी। अजित सिंह के जनाधार में भाजपा ने काफी हद तक पैठ बना ली है, इसलिए राष्ट्रीय लोकदल के साथ हाथ मिलाने में अब सपा की कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। बहरहाल, गठजोड़ के लिए कांग्रेस का लालायित होना तो समझ में आता है, सपा क्यों उससे गठजोड़ करना चाहेगी। ऐसा लगता है कि भाजपा की चुनौती से अकेले निपट पाने और केवल अपने बूते सत्ता में वापसी का आत्मविश्वास सपा में नहीं रह गया है। फिर, उसे लगता होगा कि कांग्रेस से गठजोड़ उसे बसपा पर थोड़ी बढ़त दिला देगा और तब अल्पसंख्यक मतदाता दुविधा छोड़ इधर का ही रुख करेंगे।
जैसे भाजपा को सबसे बड़ा आसरा मोदी की लोकप्रियता का है, वैसे ही सपा का सबसे बड़ा दांव अखिलेश यादव की छवि है। युवा होने के अलावा पांच साल के मुख्यमंत्रित्व-काल में अखिलेश पर सीधे कोई आरोप न लगने और विकास-कार्यों ने उनकी जैसी छवि बनाई है उससे गठजोड़ की सूरत में कांग्रेस को लाभ दिख रहा होगा। फिर, कांग्रेस और सपा, दोनों पार्टियां नेतृत्व की पीढ़ी बदलने के मुकाम पर हैं। कांग्रेस को यह भी लगता होगा कि राहुल गांधी और अखिलेश की पटरी बैठ गई तो वह टिकाऊ भी हो सकती है और राष्ट्रीय स्तर पर भी गुल खिला सकती है। लेकिन राजनीति में और खासकर चुनाव में सब कुछ सदिच्छा या तकाजे से ही नहीं होता। अपने-अपने हित का गणित बैठने पर ही गठजोड़ हो पाता है। इसलिए उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन होगा या नहीं, यह बहुत कुछ सीटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा। कांग्रेस को अधिकतर जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारने का लोभ छोड़ना पड़ेगा। क्या वह इसके लिए तैयार होगी?
